पिछले दो वर्षों से महामारी के दौर में अनिच्छा या स्वेच्छा से शिक्षक, संरक्षक और माता-पिता को बच्चों को चाहे छोटे बच्चे हो या बड़े बच्चे उनकी पढ़ाई के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आने की अनुमति देनी पड़ी जो कि आवश्यक था लेकिन साथ ही यह चुनौतीपूर्ण भी रहा और अभी भी चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। ऑनलाइन काम या पढ़ाई करना हमारे लिए न्यू नार्मल हो सकता है लेकिन छोटे बच्चों के लिए यह एक और समानांतर दुनिया है।
एक ऐसी दुनिया जहां वे खुद को अपनी आभासी दुनिया का मालिक मान लेते हैं जिसके बारे में कोई नहीं जानता। तकनीकी से वे अनोखे प्रयोग करते हैं जिसकी वजह से वो कभी-कभी जालसाजी और धोखे का भी शिकार हो सकते हैं। बच्चों की सुरक्षा सभी का प्रथम ध्येय रहता है परन्तु वर्चुल दुनिया में भी उनकी सुरक्षा उतनी ही जरूरी है। इसके लिए माता पिता, शिक्षक और शुभचिंतक मिलकर उन्हें समय समय पर सचेत करें यह हमारी कोशिश रहती है। इतने वर्षों के अनुभव से यह समझ आता है की हमारी कोई एक सलाह कभी भी बच्चों के गलत निर्णय की दिशा बदल सकती है।
ऑनलाइन कार्य करते समय बच्चों को कई समस्याओं का सामना करना पडता है जैसे कि जानकारी की अधिकता से सही गलत की पहचान न होना, हिंसा देखना सामान्य सा लगना, ध्यान केंद्रित नहीं होना, विद्रोही होना, अभद्र भाषा और मीम की भाषा का इस्तेमाल करना, ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार होना आदि। सोशल मीडिया एल्गोरिदम अधिक सर्फ करने के लिए अनायास ही आकर्षित करता है। आपके डिजिटल फुटप्रिंट्स के आधार पर आपको उसी दिशा में खींचता जाता है जो आप ढूंढ रहे होते हैं, डार्कनेट के कुप्रभाव ने बच्चों को माता-पिता से भी दूर कर दिया है। डार्कनेट यानी कि अवैध ऑनलाइन गतिविधियाँ जो प्रतिबंधित है वहां-जहां आयु सीमा बढ़ाकर बच्चे शामिल हो रहे हैं यह मानसिक विकास के लिए भी घातक है।
सोशल मीडिया के सबसे अच्छे लगने की स्पर्धा के दबाव के कारण हमेशा सुन्दर लगना और सुन्दरता बढ़ाने वाले ऐप का इस्तेमाल नवजवान युवक और युवतियों को इसी में उलझाये रखता है। ऑनलाइन दुनिया बच्चों के लिए सुरक्षित है यह सुनिश्चित करने के लिए हमें यानी कि माता-पिता, शिक्षकों को पहले स्वयं सीखना होगा कि क्या इसकी चुनौतियाँ हैं और कैसे इनसे बचें।
चुनौतियों और समाधान से सूचित रहें, बच्चों से इस विषय पर बात अवश्य करते रहें। उन्हें जागरूक करें, स्वयं के लिए टाइमर सेट करें, स्कूल के काम के लिए तकनीक का सही इस्तेमाल करना सिखायें। माता-पिता बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नियंत्रण स्वयं करें और उन्हें ऑनलाइन खतरों और अवसरों के बारे में सचेत करें। तकनीकी सुविधाओं पर रोक लगाने के बजाए उन्हें सुरक्षित रूप से उपयोग करने में सहायता करें। यदि संभव हो तो बच्चों के साथ उनके प्रोग्राम देखें या उस पर बातचीत करें। व्यक्तिगत जानकारी को अधिक सांझा न करने के संभव नुकसान से उन्हें अवगत करायें। वास्तविकता से मिथक को अलग करना सीखें और सिखायें। बच्चें आयु प्रतिबंध साइट्स के लिए साइन अप न करें। यदि इन पहलुओं को पहचाने और अमल करें तो परेशानियों और इनके कुप्रभाव से बहुत हद तक बचा जा सकता है। स्कूल में छात्र एवं छात्राएं "डिजिटल वेलनेस कॉमरेड्स बनाये जो कि स्वयं भी सूचित रहें अन्य को भी डिजिटल सेफ्टी के बारे में बताये।
सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की एक पहल डिजिटल सेफ्टी और मेन्टल वेल बीइंग, जो META वी थिंक डिजिटल के समर्थन से पूरे देश में चल रहा है, अभी तक 3,00,000 से जादा स्कूली बच्चो को ट्रेनिंग वर्कशॉप द्वारा प्रभावित कर चुका है। बच्चों को साइबर अपराध से समन्वित कर प्रभावी तरीके से साइबर अपराधों से निपटने के लिए एक पहल है जो जानकारी रखने और जागरूकता फैलाने के लिए मददगार है। समय समय पर शिक्षण संस्थानों और विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा कार्यशालाओं का आयोजन सेंटर फॉर सोशल रिसर्च द्वारा किया जा रहा है जो कि जागरूकता की और सराहनीय कदम है।
Author/Writer
Dr. Pragya Kaushik Media Educator
(The author holds a doctorate in Mass communication. A former Assistant Professor of Mass Communication department,GJUS&T.t,GJUS&T.)