राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर पंजीकरण
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असम पुलिस स्वीकार करती है कि ये मौतें अप्राकृतिक हैं, लेकिन उसका कहना है कि इन मौतों को नागरिकता पहचान को लेकर चल रही प्रक्रिया से जोड़ने के लिए उनके पास पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं।
एक शोधकर्ता अब्दुल कलाम आजाद, साल 2015 में जबसे रजिस्टर अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू हुई तबसे आत्महत्याओं का रिकॉर्ड रख रहे हैं। वो कहते हैं, "पिछले साल जबसे एनआरसी का फाइनल ड्राफ्ट प्रकाशित हुआ है तबसे इस तरह के मामले बढ़े हैं।"
उन्होंने बताया, "पीड़ितों से संबंधित लोगों से मैं मिलता रहा हूं। जिन लोगों ने खुदकुशी की उन्हें या तो संदेहास्पद मतदाता घोषित कर दिया गया था या एनआरसी सूची से उन्हें बाहर कर दिया गया था. ये बहुत दुखद है।"
नागरिक अधिकार कार्यकर्ता जामसेर अली के अनुसार, असम के बारपेटा जिले में एक दिहाड़ी मजदूर 46 साल के सैमसुल हक ने पिछले नवंबर में आत्महत्या कर ली क्योंकि उनकी पत्नी मलेका खातून को सूची में शामिल नहीं किया गया था।
साल 2005 में मलेका को संदेहास्पद मतदाता घोषित कर दिया गया था लेकिन बारपेटा के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में वो ये मामला जीत गईं। इसके बावजूद उनका नाम वोटर लिस्ट या एनआरसी में शामिल नहीं हो पाया।
पीढ़ियों की त्रासदी
कुछ मामलों में एनआरसी की छाया ने कई पीढ़ियों पर अपना त्रासद असर डाला है। इसी साल मार्च में असम के उडालगिरी जिले में एक दिहाड़ी मजदूर 49 साल के भाबेन दास ने खुदकुशी कर ली. उनके परिवार ने कहा कि कानूनी लड़ाई के लिए लिए गए कर्ज को वो अदा नहीं कर सके थे।
दास के वकील ने एनआरसी में शामिल किए जाने की अपील की थी, इसके बावजूद उनका नाम जुलाई में जारी की गई सूची में शामिल नहीं हो पाया।
इस परिवार में एनआरसी को लेकर ये दूसरी त्रासदी थी, क्योंकि 30 साल पहले उनके पिता ने भी खुदकुशी कर ली थी क्योंकि उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कहा गया था। हालांकि उनकी मौत के कुछ महीने बाद ही ट्रिब्यूनल ने उन्हें भारतीय घोषित कर दिया था।
खरुपेटिया कस्बे में जब स्कूल टीचर और वकील निरोड बारन दास अपने घर में मृत पाए गए थे, तो उनके दोस्तों और रिश्तेदारों ने बताया कि उस समय उनके शव के पास तीन दस्तावेज मिले थे।
एक एनआरसी नोटिफिकेशन जिसमें उन्हें विदेशी घोषित किया गया था, एक सुसाइड नोट, जिसमें कहा गया था कि उनके परिवार का कोई भी व्यक्ति इसके लिए जिम्मेदार नहीं है और पत्नी को लिखा गया पत्र जिसमें दोस्तों से लिए गए छोटे कर्ज को अदा करने की बात कही गई थी।
उनके भाई अखिल चंद्र दास ने कहा, "साल 1968 में वो ग्रैजुएट हुए थे और 30 सालों तक पढ़ाया। उनके स्कूल के सर्टिफिकेट से साबित होता है कि वो विदेशी नहीं थे। उनकी मौत के लिए एनआरसी लागू करने वाले अधिकारी जिम्मेदार हैं।"
हाल ही में भारत के एक पुरस्कार प्राप्त पूर्व सैनिक मोहम्मद सनाउल्लाह की कहानी प्रकाशित की थी। विदेशी घोषित किए जाने के बाद जून में उन्हें 11 दिनों तक डिटेंशन सेंटर में रखा गया, जिसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर हंगामा हुआ।
डिटेंशन सेंटर से छूटने के बाद सनाउल्लाह ने कहा था, "मैंने भारत के लिए अपनी जिंदगी के लिए खतरा मोल लिया था। मैं हमेशा भारतीय रहूंगा। ये पूरी प्रक्रिया बिल्कुल गड़बड़ है।"
सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी की अंतिम सूची बनाने के लिए 31 जुलाई तक की समय सीमा तय की है। असम की राज्य सरकार तेजी से ये सूची तैयार कर रही है। लाखों बंगाली हिंदू और मुस्लिम राज्य विहीन बनाए का सामना कर रहे हैं।
एक स्थानीय वकील हाफिज राशिद चौधरी कहते हैं, "एनआरसी ड्राफ्ट से बाहर किए गए 40 लाख लोगों में से कई अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाएंगे। हो सकता है कि ये संख्या आधे से भी ज्यादा हो।"