करीब 5500 कर्मचारियों और सालाना 6 हजार करोड़ रुपये के टर्नओवर वाली हरेकृष्णा एक्सपोर्टर कंपनी को खड़ा करने वाले सावजी की अपनी कहानी भी अनोखी है। आर्थिक तंगी के चलते महज 13 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ने वाले सावजी अमरेली जिले के दूधला गांव निवासी हैं।
वे 41 साल पहले वर्ष 1977 में गांव से जेब में महज 12.5 रुपये लेकर सूरत अपने चाचा के यहां आए थे। ये पैसे भी उन्होंने रोडवेज बस का टिकट खरीदने में खर्च कर दिए थे। ऐसे हालात के बावजूद उन्होंने इतनी बड़ी कंपनी खड़ी की, जिसके लिए वे अपने कर्मचारियों की मेहनत को जिम्मेदार मानते हैं। सावजी को उनकी दरियादिली के कारण सूरत और उसके आसपास सौराष्ट्र क्षेत्र में सावजी काका कहकर बुलाया जाता है।
सावजी के बेटे द्रव्य ने अमेरिका की पेस यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है। लेकिन पारिवारिक परंपरा के तहत सावजी ने उसे ट्रेन की सामान्य बोगी का टिकट देकर कोच्चि भेज दिया था, जहां द्रव्य को एक महीने तक अपने दम पर गुजर-बसर करके दिखाना था और कम से कम तीन नौकरी इस एक महीने में करनी थी।
कोच्चि में द्रव्य ने महज 350 रुपये किराए वाले कमरे में रहकर बेकरी, रेस्टोरेंट और कॉल सेंटर में नौकरी कर खर्च चलाया था। इस दौरान द्रव्य को जेब में पैसे नहीं होने पर 36 घंटे भूखा भी रहना पड़ा था।