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Devvrat Rekhe: वेद ज्ञान से इतिहास रचने वाले देवव्रत ने PM मोदी का जताया शुक्रिया, बोले- मैं आभारी हूं

Wed, 03 Dec 2025 11:52 PM IST
शिवम गर्ग न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मिली बधाई पर 19 वर्षीय वैदिक छात्र देवव्रत महेश रेखे ने गहरी कृतज्ञता व्यक्त की है। उन्होंने कहा मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं। 
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वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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महाराष्ट्र के अहिल्यानगर के रहने वाले वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे ने 2 अक्तूबर से 30 नवंबर के बीच वाराणसी स्थित वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय में दंडक्रम पारायण पूरा कर इतिहास रच दिया। यह अद्वितीय उपलब्धि करीब 200 साल बाद काशी में पहली बार हासिल की गई है। इससे पहले लगभग दो शताब्दी पूर्व महाराष्ट्र के नासिक में वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव ने दंडक्रम पारायण किया था। देवव्रत की इस असाधारण साधना और सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनकी सराहना की और प्रशंसा व्यक्त की है। पीएम मोदी द्वारा मिली बधाई पर 19 वर्षीय वैदिक छात्र देवव्रत ने गहरी कृतज्ञता व्यक्त की है। उन्होंने कहा मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या कहा है
पीएम ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि उनकी सफलता हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा बनने वाली हैं। देवव्रत की इस उपलब्धि पर पीएम ने सोशल मीडिया पर लिखा, भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर एक व्यक्ति को ये जानकर अच्छा लगेगा कि देवव्रत ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा के दो हजार मंत्रों वाले दंडक्रम पारायण को 50 दिनों तक बिना किसी अवरोध के पूर्ण किया है। इसमें अनेक वैदिक ऋचाएं और पवित्र शब्दों का त्रुटिहीन उच्चारण शामिल है।

 

 

ये उपलब्धि हमारी गुरु परंपरा के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। उन्होंने कहा, काशी का सांसद होने के नाते मुझे इस बात का गर्व है कि उनकी यह अद्भुत साधना इसी पवित्र धरती पर संभव हुई। उनके परिवार, विभिन्न संतों, ऋषियों, विद्वानों और देशभर की उन संस्थाओं को मेरा प्रणाम, जिन्होंने इस तपस्या में उन्हें सहयोग किया। नमो घाट पर काशी तमिल संगमम के मंच पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने देवव्रत महेश रेखे घनपाठी को सम्मानित किया।

देवव्रत महेश रेखे की उपलब्धि क्यों 'ऐतिहासिक'?
देवव्रत की उपलब्धि का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका इतिहास है।  ऐसा माना जाता है कि 'दंडक्रम पारायण' का यह कठिन स्वरूप पिछले 200 वर्षों में किसी ने पूर्ण नहीं किया था। इससे पहले, लगभग दो सदी पूर्व नासिक के वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव ने यह उपलब्धि हासिल की थी। आज के डिजिटल दौर में, जब याददाश्त पर तकनीक हावी है, एक 19 साल के युवा द्वारा हजारों मंत्रों को कंठस्थ करना और उन्हें त्रुटिहीन सुनाना एक चमत्कार जैसा है। देवव्रत की इस सिद्धि ने देश के शीर्ष नेतृत्व का ध्यान अपनी ओर खींचा।

क्या है 'दंडक्रम पारायण साधना' जिसकी हर तरफ चर्चा?

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देवव्रत ने जिस उपलब्धि को हासिल किया है, उसे वैदिक शब्दावली में 'दंडक्रम पारायण' कहा जाता है। यह वेदों के पाठ की सबसे जटिल विधियों में से एक है। यह पाठ शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा से संबंधित है। इसमें करीब 2,000 मंत्र शामिल हैं। इसके पाठ के नियम भी कठिन हैं। देवव्रत को बिना किसी ग्रंथ को देखे (कंठस्थ), पूरी शुद्धता और लय के साथ इन मंत्रों का उच्चारण करना था, और उन्होंने इसे कर दिखाया। यह अनुष्ठान लगातार 50 दिनों तक चला। उन्होंने 2 अक्तूबर से 30 नवंबर तक बिना किसी बाधा के इस उपलब्धि हो हासिल किया।  30 नवंबर को दंडक्रम पारायण की पूर्णाहुति के बाद उन्हें शृंगेरी शंकराचार्य ने सम्मान स्वरूप सोने का कंगन और 1,01,116 रुपये दिया गया। दंडक्रम पारायणकर्ता अभिनंदन समिति के पदाधिकारियों चल्ला अन्नपूर्णा प्रसाद, चल्ला सुब्बाराव, अनिल किंजवडेकर, चंद्रशेखर द्रविड़ घनपाठी, प्रो. माधव जर्नादन रटाटे व पांडुरंग पुराणिक ने बताया कि नित्य साढ़े तीन से चार घंटे पाठ कर देवव्रत ने इसे पूरा किया।
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