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कर्कश बयानों में खो गया गुजरात का विकास

Wed, 06 Dec 2017 07:07 PM IST
अतुल सिन्हा/ अमर उजाला
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कहानी कहां से शुरू हुई और कहां पहुंच गई। अमूमन हर चुनाव के करीब आते आते भाषणों का रंग बदल जाता है, मुद्दा कहीं गुम हो जाता है और आरोप प्रत्यारोप के बौखलाहट भरे स्वर तल्ख होने लगते हैं। इस बार भी यही दिख रहा है। 
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नरेंद्र मोदी ने विकास के जिस 'गुजरात मॉडल' को दुनिया के सामने पेश किया, उसमें डर की तो कहीं कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। फिर राहुल गांधी का भूत या कांग्रेस का प्रेत भाजपा को डराने कैसे लगा? हर भाषण में आखिर ऐसे ऐसे वाक्य क्यों और कैसे आने लगे?

राहुल गांधी अपनी सभाओं में मोदी से नए नए सवाल करते हैं... नोटबंदी, जीएसटी, राफेल सौदा, जय शाह, चंद उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने से लेकर किसानों की कर्जमाफी, रोजगार के दावे, 50 लाख घर देने के वादे और ऐसे तमाम सवाल जो गुजरात के विकास की असली कहानी कहते हैं। 
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राहुल मंदिरों में जाते हैं तो उनके हिंदू होने पर सवाल उठाकर चुनावी एजेंडे को धर्म की तरफ मोड़ दिया जाता है। जिस 'पागल' विकास से गुजरात की चुनावी कहानी शुरू हुई वो अब धर्म, जाति, गुजराती अस्मिता से होती हुई बौखलाहट तक आ पहुंची। कुछ नहीं तो वंशवाद के घिसे पिटे राग पर जा अटकी।

अहमदाबाद और गांधीनगर में तो सत्ता का केंद्र है। बड़े-बड़े नेता, सीएम, डिप्टी सीएम से लेकर पार्टियों के दफ्तर तक... यहीं साबरमती रिवर फ्रंट है, बड़े मॉल्स हैं, विकास दिखाने के लिए यहां बहुत कुछ है। 

कहा जाता है कि गुजरात की सड़कें बहुत अच्छी हैं... ज्यादातर हैं भी। लेकिन जरा मोरबी से अहमदाबाद आने वाली सड़क देख लीजिए.. मोरबी के सेरामिक उद्योग से जुड़े कारोबारी इस सड़क से परेशान हैं... उन्हें अहमदाबाद आने के लिए राजकोट वाला लंबा रास्ता लेना पड़ता है। और जरा पोरबंदर से जूनागढ़ होते हुए सोमनाथ जाने वाली सड़क भी देख लीजिए...। अब आप कह सकते हैं विकास का काम चल रहा है.. सड़कें बन रही हैं.. आने वाले कुछ सालों में ठीक हो जाएंगी। 

लेकिन मोदी को चाहने वाले आपको गुजरात के गांव गांव में मिल जाएंगे। मोदी जब तक गुजरात में रहे, पूरी दिलेरी से काम किया और खुद को कुछ इस तरह लोकप्रिय बना लिया कि लोग उन्हें अपना मानने लगे। जूनागढ़, जामनगर, राजकोट के कई गांवों में, भुज और कच्छ में, पोरबंदर के गांवों में और सोमनाथ, द्वारका में मोदी के नाम का डंका बजता है। 

राहुल गांधी ने अपनी छवि सुधारी

राहुल गांधी
गांव की महिलाएं हों, खेड़ू (किसान) हों या फिर रण में ऊंटगाड़ी चलाने वाले, सब मोदी को तो जानते हैं, लेकिन रुपाणी, अमित शाह या आनंदीबेन को नहीं। इनमें से ज्यादातर यही कहते हैं कि मोदी के व्यक्तित्व का जवाब नहीं और वही गुजरात का विकास कर सकते हैं। लेकिन ये भी कहते हैं कि उनके दिल्ली चले जाने से मुश्किल हो गई है, गुजरात में मुश्किलें बढ़ गई हैं, नेता-मंत्री सब कमाई में लगे हैं, जाति के झगड़े बढ़ गए हैं, कोई नोटबंदी की मुश्किलें गिनाता है तो कोई जीएसटी के बाद बढ़ी महंगाई की बात करता है। फिर भी इनका मानना है कि मोदी सब ठीक कर देंगे।

गुजरात में हर कोई यही कह रहा है कि राहुल गांधी ने अपनी छवि सुधारी है। उनके भाषणों और जगह जगह घूमने का अंदाज लोगों को रास आया है। भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता भी ये मानते हैं और भाजपा मीडिया सेल के संजय मयूक और हर्षद भाई भी। उनका मानना है कि राहुल को हम कमजोर मानकर नहीं चल रहे। उनके एक एक आरोपों का बाकायदा जवाब दे रहे हैं, लोगों को बता रहे हैं कि उनके आरोपों में दम नहीं है और 22 साल में भाजपा ने जो किया है, वो कोई और नहीं कर सकता।

कांग्रेस के मीडिया प्रभारी मनीष जोशी और निशीथ व्यास बेशक कांग्रेस के हों लेकिन बड़बोले अंदाज में कुछ नहीं कहते 'आप खुद ही लोगों से बात कर लीजिए, देख लीजिए कि राहुल गांधी को लोग कैसे एक संजीदा और अपने बीच का मानने लग गए हैं। ठीक है कि हमारी हालत अच्छी नहीं, हम 22 साल से सत्ता से बाहर हैं, संगठन कमजोर है, लेकिन गुजरात के लोग बदलाव चाहते हैं और पिछले दो तीन महीनों में ये बात सबकी जुबान पर सुनाई दे रही है।' 

कांग्रेस के नेता ये दावा नहीं करते कि सरकार बनाने जा रहे हैं। बल्कि ये कहते हैं कि मजबूत विकल्प के अभाव में भाजपा अगर फिर से सरकार बना लेती है तो ताज्जुब नहीं, लेकिन हमारी ताकत बढ़ी है, ये सब देखेंगे।

लेकिन मुश्किल ये है कि मोदी जी और उनकी टीम के बाकी नेता बार बार विकास के एजेंडे से हटकर कांग्रेस को जवाब देने में, राहुल गांधी को इतिहास याद दिलाने में और बार-बार उनके खानदान को निशाने पर लेने में लग गए हैं। उनके भाषणों का अंदाज भी कुछ ऐसा कसैला सा हो गया है कि लगता है एक अकेले राहुल गांधी उन्हें डराने लगे हैं।
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सबके निशाने पर राहुल गांधी और कांग्रेस खानदान

पूरी मीडिया और पूरा देश ये कह रहा है कि कुछ भी हो सरकार तो भाजपा की ही बनने जा रही है। साम-दाम-दंड-भेद में माहिर अमित शाह को लोग लाख नापसंद करें, लेकिन इस खेल में फिर बाजी वही मारने वाले हैं।

अब सवाल सिर्फ ये है कि मिशन 150 के लिए क्या यही रणनीति कामयाब होगी जिसमें सिर्फ राहुल गांधी और उनके खानदान को निशाना बनाने से लेकर गांधी को किनारे करके सरदार पटेल के नाम पर वोटों का ध्रुवीकरण करना हो या फिर मुद्दे को विकास से हटाकर कांग्रेसवाद के खतरे, नेहरू-गांधी खानदान के इतिहास या फिर धर्म और जाति तक ले आना हो?

क्या कहीं ये किसी बौखलाहट का संकेत तो नहीं है? अब तो उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव के नतीजे भी आपकी उपलब्धियों की फेहरिस्त में जुड़ गए और फिर योगी आदित्यनाथ, वसुंधरा राजे के साथ साथ भाजपा के 50 नेताओं की टीम पूरे गुजरात में तूफान की तरह घूम रही है। 

जाहिर है सबके निशाने पर राहुल गांधी और कांग्रेस खानदान ही है। नेहरू के चरित्र पर हमला, इंदिरा गांधी के शासनकाल और इमरजेंसी से लेकर वंशवाद और अब ताजा-ताजा मणिशंकर अय्यर के औरंगजेब वाले आधे अधूरे बयान को लेकर वार। 

भाषणों का जो स्तर है उसमें विकास की कहानी कहीं हाशिये पर जाती दिख रही है। भला धर्म, जाति, गुजराती अस्मिता, वंशवाद, 'औरंगजेब राज' और कांग्रेस फोबिया के खेल में उसे कौन पूछ रहा है। और अब बेचारा 'पागल' विकास अपने लिए भाषणों में जगह तलाशता घूम रहा है। 
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