कहानी कहां से शुरू हुई और कहां पहुंच गई। अमूमन हर चुनाव के करीब आते आते भाषणों का रंग बदल जाता है, मुद्दा कहीं गुम हो जाता है और आरोप प्रत्यारोप के बौखलाहट भरे स्वर तल्ख होने लगते हैं। इस बार भी यही दिख रहा है।
नरेंद्र मोदी ने विकास के जिस 'गुजरात मॉडल' को दुनिया के सामने पेश किया, उसमें डर की तो कहीं कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। फिर राहुल गांधी का भूत या कांग्रेस का प्रेत भाजपा को डराने कैसे लगा? हर भाषण में आखिर ऐसे ऐसे वाक्य क्यों और कैसे आने लगे?
राहुल गांधी अपनी सभाओं में मोदी से नए नए सवाल करते हैं... नोटबंदी, जीएसटी, राफेल सौदा, जय शाह, चंद उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने से लेकर किसानों की कर्जमाफी, रोजगार के दावे, 50 लाख घर देने के वादे और ऐसे तमाम सवाल जो गुजरात के विकास की असली कहानी कहते हैं।
राहुल मंदिरों में जाते हैं तो उनके हिंदू होने पर सवाल उठाकर चुनावी एजेंडे को धर्म की तरफ मोड़ दिया जाता है। जिस 'पागल' विकास से गुजरात की चुनावी कहानी शुरू हुई वो अब धर्म, जाति, गुजराती अस्मिता से होती हुई बौखलाहट तक आ पहुंची। कुछ नहीं तो वंशवाद के घिसे पिटे राग पर जा अटकी।
अहमदाबाद और गांधीनगर में तो सत्ता का केंद्र है। बड़े-बड़े नेता, सीएम, डिप्टी सीएम से लेकर पार्टियों के दफ्तर तक... यहीं साबरमती रिवर फ्रंट है, बड़े मॉल्स हैं, विकास दिखाने के लिए यहां बहुत कुछ है।
कहा जाता है कि गुजरात की सड़कें बहुत अच्छी हैं... ज्यादातर हैं भी। लेकिन जरा मोरबी से अहमदाबाद आने वाली सड़क देख लीजिए.. मोरबी के सेरामिक उद्योग से जुड़े कारोबारी इस सड़क से परेशान हैं... उन्हें अहमदाबाद आने के लिए राजकोट वाला लंबा रास्ता लेना पड़ता है। और जरा पोरबंदर से जूनागढ़ होते हुए सोमनाथ जाने वाली सड़क भी देख लीजिए...। अब आप कह सकते हैं विकास का काम चल रहा है.. सड़कें बन रही हैं.. आने वाले कुछ सालों में ठीक हो जाएंगी।
लेकिन मोदी को चाहने वाले आपको गुजरात के गांव गांव में मिल जाएंगे। मोदी जब तक गुजरात में रहे, पूरी दिलेरी से काम किया और खुद को कुछ इस तरह लोकप्रिय बना लिया कि लोग उन्हें अपना मानने लगे। जूनागढ़, जामनगर, राजकोट के कई गांवों में, भुज और कच्छ में, पोरबंदर के गांवों में और सोमनाथ, द्वारका में मोदी के नाम का डंका बजता है।