क्या है पूरा मामला
दरअसल, केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव करते हुए इसका नियमन करने वाली संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को खत्म कर दिया है। इसकी जगह 24 सितंबर 2020 से नेशनल मेडिकल कमीशन यानी एनएमसी का गठन कर दिया गया है। एनएमसी का गठन करने के समय ही सरकार ने बिल के बिंदु 60(3) में स्पष्ट कर दिया था कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पुराने कर्मचारियों को तीन महीने का वेतन देकर हटा दिया जाएगा।
लेकिन केंद्र सरकार के इस फैसले के विरोध में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के 92 कर्मचारी दिल्ली हाईकोर्ट चले गए और खुद को हटाए जाने का विरोध किया। कर्मचारियों ने कोर्ट को बताया कि इनमें से अनेक कर्मचारी 20-30 साल तक से मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में काम करते रहे हैं, इसलिए उन्हें अचानक इस तरह से हटाना गलत है। नई संस्था का गठन करने के समय सरकार को इन कर्मचारियों को नई संंस्था में या किसी अन्य जगह पर स्थानांतरित करना चाहिए। न्यायमूर्ति हेमा कोहली और न्यायमूर्ति आशा मेनन की बेंच ने कर्मचारियों का पक्ष सुनते हुए उनको हटाए जाने के बिंंदु पर 14 नवंबर 2019 को स्टे ऑर्डर जारी कर दिया। यह स्टे ऑर्डर अभी भी नवंबर तक प्रभावी है। मामले की अगली सुनवाई 9 नवंबर 2020 को है।
पांच अक्टूबर को आया ये आदेश
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में पिछले 28 साल से निजी सचिव की भूमिका निभा रहे रवि भार्गव ने अमर उजाला को बताया कि वे 1992 से यहां काम कर रहे हैं। उनकी नौकरी स्थाई प्रकृति की है और वे पेंशन के भी हकदार हैं। लेकिन इस तरह अचानक हटाए जाने के विरोध में उन्होंने अदालत में अपील की थी, जिस पर अभी स्टे ऑर्डर जारी है। लेकिन कोर्ट के स्टे ऑर्डर को नजरअंदाज करते हुए केंद्र सरकार ने 5 अक्टूबर 2020 को एक आदेश जारी करते हुए उनके जैसे 92 कर्मचारियों को ऑफिस न आने का आदेश जारी कर दिया। आज जब वे अपने साथियों के साथ कार्यालय पहुंचे तो यहां उन्हें ताला बंद मिला। सभी 92 कर्मचारियों को कार्यालय में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा है। नेशनल मेडिकल कमीशन (पुरानेे में एमसीआई) का यह कार्यालय द्वारका के सेक्टर-8 के पॉकेट-14 में स्थित है।
सबसे ज्यादा इन्हें नुकसान
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को निरस्त करने का सबसे बड़ा नुकसान चारू नेगी जैसी महिलाओं को उठाना पड़ रहा है, जो पिछले 11 साल से यहां सीनियर स्टेनो का काम करती आ रही थीं। चारू ने कहा कि सरकार ने तीन महीने का वेतन देने की बात कहकर उन्हें अचानक हटा दिया है। अब उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि कोरोना काल में उन्हें दूसरी नौकरी कैसे और कहां मिलेगी। नौकरी न मिलने की स्थिति में उनके घर का गुजारा कैसे चलेगा। उनके ऊपर अपने मां-पिता के साथ-साथ बच्चों को पालने की भी जिम्मेदारी है।
इसी प्रकार किरण बाला पांडे पिछले 16 साल से मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में काम करती आ रही थीं। कंप्यूटर ऑपरेटर की नौकरी करते हुए वे अपने परिवार का खर्च चलाती थीं और अपने बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ घर का पूरा खर्च उठाती थीं। लेकिन पांच अक्टूबर को अचानक आए आदेश ने उनकी जिंदगी में अंधेरा कर दिया है। किरण बाला पांडे कहती हैं कि सरकार को संस्थागत जो भी बदलाव करना है वो करे, लेकिन उसे उनके जैसे गरीब कर्मचारियों की आजीविका का भी ध्यान रखना चाहिए, जो अपनी इसी आजीविका पर पूरी तरह निर्भर हैं। कर्मचारियों की मांग है कि उन्हें किसी दूसरी जगह वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराया जाना चाहिए।