यह हैरत भरा सच है कि केंद्रीय गृहमंत्रालय की एडवाइजरी और प्रशासन की हिदायतों के बाद भी इस बार सरहद और नियंत्रण रेखा पर बसा कोई भी गांव खाली नहीं हुआ है। एहतियातन जिन परिवारों की महिलाओं और बच्चों ने बृहस्पतिवार की रात कैंपों या रिश्तेदारों के घर बिताई, वे भी शुक्रवार को पौ फटते ही अपने-अपने घरों में पहुंच गए। हालांकि कुछ लोगों ने अपने परिवार सुरक्षित ठिकानों पर भी पहुंचाए हैं। ऐसे 50 से भी अधिक गांवों में पहुंची अमर उजाला की टीमों से इन गांवों के बाशिंदों का कहना था कि अब कुछ भी हो जाए, हम अपनी दहलीज नहीं छोड़ेंगे।
शुक्रवार को श्राद्ध का आखिरी दिन था। शनिवार से नवरात्र प्रारंभ हो रहे हैं। ज्यादातर लोग घरों में माता को विराजमान करते हैं। फिर करवाचौथ है, दशहरा है और दीपावली भी। त्योहारों के इस सीजन में कोई भी अपना घर सूना छोड़ने को राजी नहीं। वे आशंकित तो हैं लेकिन आतंकी कैंपों की तबाही से आश्वस्त भी हैं। सुचेतगढ़ की तहसीलदार सविता चौहान ने बताया कि उनके क्षेत्र के 104 भारतीय गांवों को खाली करने का आदेश दिया गया है लेकिन कई गांवों में ग्रामीण अब भी डटे हैं। आरएसपुरा और मीरां साहिब में ग्रामीणों के लिए बनाए कैंपों में गिने-चुने लोग ही आए हैं।
सुचेतगढ़ के नंबरदार बुजुर्ग वेली राम कहते हैं कि गांव छोड़कर कही नहीं जाएंगे। फौज हमारी चिंता नहीं करे, हम गोली खा लेंगे लेकिन एक बार पाकिस्तान के होश ठिकाने लगाना जरूरी है। आरपार की लड़ाई होनी चाहिए। हम हर साल पाक की गोलाबारी झेलते हैं, इस बार भी झेल लेंगे। लेकिन एक बार दुश्मन के दांत खट्टे हुए तो वह फिर सिर नहीं उठा सकेगा। इसी तरह कठुआ, रामगढ़, हीरानगर, सांबा सेक्टरों के भी अधिकतर ग्रामीण घर नहीं छोड़ना चाहते। हीरानगर सेक्टर के रठुआ, पानसर, मनियारी, चकड़ा सहित 22 गांव जीरो लाइन पर हैं। अभी तक कुछेक परिवारों को छोड़कर यहां के बाशिंदों ने अपने आशियाने नहीं छोड़े हैं। एलओसी के हालात इससे कुछ अलग हैं।
मवेशियों की मोहब्बत रोक लेती है पांव
ग्रामीणों के लिए मवेशी उनकी लाइफ लाइन है। पिछले सालों में पाकिस्तानी गोलों ने कई मवेशियों की जान ली है। उन्हें साथ ले जाना मुश्किल होता है और गांव में छोड़ें तो चारा-पानी की दिक्कत। पशु भूखे रहें तो खुद के हलक से भी निवाला नहीं उतरता। यह भी एक बड़ी वजह है गांव न छोड़ने की। किसी अनहोनी की आशंका से सीमावर्ती ग्रामीणों ने मवेशियों के लिए चारे को स्टोर करना शुरू कर दिया है। अब्दुल्लियां गांव में कई परिवार ऐसे मिले जो हरा चारा बैलगाड़ी से घर पहुंचा रहे थे। इनका कहना था कि गोलाबारी होने पर मवेशियों के लिए चारे का संकट उत्पन्न हो जाता है। इस वजह से उन्होंने पहले से ही इसका इंतजाम कर लिया है। रिगाल गांव के मेजर सिंह और बलबीर सिंह ने बताया मवेशी उनके लिए परिवार का हिस्सा हैं। वे उनके चेहरों के भाव तक समझते हैं, उन्हें भूखे नहीं छोड़ सकते।