फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कोरोना के सुरक्षा चक्र में लगी सेंध, अब महामारी के संक्रमण से कैसे बचेगा ग्रामीण भारत!

Wed, 20 May 2020 06:39 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

रोहतक रेलवे स्टेशन पर मंगलवार को टीकमगढ़ के लिए चली गाड़ी को सैनिटाइज कर रहे कर्मियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ऐसा कुछ नहीं होता। 80 लीटर पानी में 50 ग्राम घोल डाल देते हैं। इससे तो कुछ देर के लिए मक्खी ही रूक पाती है...
विज्ञापन
Migrants at railway station - फोटो : PTI (for Reference)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

केंद्र सरकार ने कोरोना वायरस से बचाव के लिए जो सुरक्षा चक्र तैयार किया था, वह अब टूटने लगा है। यहां एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या अब कोरोना के संक्रमण से बच पाएगा ग्रामीण इलाका।

विज्ञापन

इसकी वजह है कि बसों और ट्रेनों से जिन मजदूरों को ले जाया जा रहा है, वहां पर द्रीय गृह मंत्रालय या स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से जारी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं हो रहा है। सोशल डिस्टेंसिंग, सैनिटाइजर और स्वास्थ्य अधिकारी की क्लीन चिट, कुछ भी तो नहीं हो रहा है।

ऐसा भी नहीं है कि जहां से ये मजदूर चले हैं, वहां अव्यवस्थित तरीके से कोरोना का टेस्ट हुआ है। जिस जगह पर ये उतरते हैं, वहां भी केवल बुखार मापा जाता है। स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव कहते हैं, दुनिया के किसी देश से क्या ऐसी तस्वीरें आ रही हैं, जैसी हमारे देश में मजदूरों की दुर्गति हो रही है।
विज्ञापन


अफ्रीका में भी इतना बुरा हाल नहीं है। ये सब बातें इशारा कर रही है कि अब ग्रामीण भारत कोरोना के कितने बड़े खतरे की ओर जा रहा है।
 

बता दें कि बस सेवा और ट्रेन सेवा शुरू होने से पहले कहा गया था कि मजदूरों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाएगा। सोशल डिस्टेंसिंग, सैनिटाइजर और टेस्टिंग होने के बाद ही श्रमिकों को ट्रेन या बस में बैठाया जाएगा।

रोहतक रेलवे स्टेशन पर मंगलवार को टीकमगढ़ के लिए चली गाड़ी को सैनिटाइज कर रहे कर्मियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ऐसा कुछ नहीं होता। 80 लीटर पानी में 50 ग्राम घोल डाल देते हैं। इससे तो कुछ देर के लिए मक्खी ही रूक पाती है।

हमें जो दिया जाता है, वो कर देते हैं। इसका असर कितनी देर रहता है तो वे बोले, कुछ नहीं एक घंटे में उड़ जाता है। दूसरा सवाल, क्या बीच में कहीं पर दोबारा से सैनिटाइज की व्यवस्था होती है तो उनका जवाब था, ऐसा कुछ नहीं है। ये राजधानी गाड़ी नहीं है, श्रमिक स्पेशल है।

स्टेशन पर देखा तो वहां केवल सवारियों का तापमान चेक किया गया। बाकी कोरोना टेस्टिंग को लेकर किसी के पास न तो कोई प्रमाण पत्र था और न ही जांच का कोई दूसरा जरिया। जिस राज्य में वे जा रहे थे, वहां पर भी सब लोगों को क्वारंटीन करने की व्यवस्था नहीं थी।

जो लोग क्वारंटीन में रखे जा रहे हैं, उनका टेस्ट नहीं किया जाता, केवल नजर रखी जाती है। यह अलग बात है कि अब कोरोना के अब जो नए केस आ रहे हैं, उनमें लक्षण नहीं दिखाई पड़ते।

सरकार को तो 50 दिन बाद मजदूरों का ध्यान आया है

योगेंद्र यादव बताते हैं कि जब पहले लॉकडाउन की घोषणा हुई तो सरकार के पास कोई प्लान ही नहीं था। दरअसल, श्रमिकों के बारे में किसी ने सोचा ही नहीं। सही मायने में उनका जिक्र लॉकडाउन के पचास दिन बीतने के बाद हुआ है।

जब एक सड़क हादसे में दर्जनों श्रमिक मारे जाते हैं तो केंद्रीय गृह मंत्रालय कहता है कि अब श्रमिक सड़क पर दिखाई न दें। रेलवे ट्रैक पर भी कड़ी नजर रखो। किसी भी तरह उन्हें सड़क से हटाओ।

राज्यों की पुलिस ने इस आदेश की आड़ में श्रमिकों पर जुल्म ढहाना शुरू कर दिया। जो जहां भी दिखता, उसे किसी स्कूल में ले जाकर बंद कर देते। इसके बाद मीडिया में श्रमिकों की बुरी हालत दिखाई जाने लगी, तो सरकार को कुछ झटका सा लगा।

गृह मंत्रालय ने दोबारा से एक आदेश दिया कि अब सड़क या रेलवे ट्रैक पर दिखने वाले मजदूरों को निकटवर्ती शेल्टर में ले जाओ। खाना दो और उन्हें समझाओ कि जल्द ही ट्रेन या बस का इंतजाम हो जाएगा।

लॉकडाउन के पहले ही दिन से श्रमिक अपने घर जाने की जरूरत महसूस कर रहे थे, लेकिन सरकार ने कोई नीति नहीं बनाई। पीएम मोदी ने लॉकडाउन की गाइडलाइन बता दीं, मगर मजदूर का जिक्र तक नहीं किया। तीसरी बार जब वे बोले तो उनके मुख से माइग्रेंट लेबर शब्द सुना है।

छोटे छोटे समूह में इनकी जांच कर क्यों नहीं रवाना किया गया

आज श्रमिक रेलवे ट्रैक पर चलने को मजबूर हैं। भेड़-बकरियों की तरह उन्हें ट्रक या बसों में ठूंसा जा रहा है। योगेंद्र यादव ने कहा, ये सब सरकार ने उस वक्त शुरू किया है, जब महामारी दो सौ गुना ज्यादा संक्रमण फैला रही है।

अब केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ गया है कि जल्द से जल्द श्रमिकों की इस समस्या का हल करो। ट्रेन में 1100 की जगह 17 सौ भी जाने लगेंगे। बसों और ट्रकों का हाल आपने देख ही लिया है। ऐसे में मेडिकल जांच की बात बेमानी सी लगती है।

कोई भी कर्मचारी उनका तापमान जांच कर अपनी ड्यूटी पूरी कर लेता है। जब पहला लॉकडाउन हुआ तो छोटे छोटे समूहों में श्रमिकों को निकाल देते। जो गाड़ी अब चला रहे हैं तो वे उस समय भी चल सकती थी।

उस वक्त देश में मरीजों की संख्या भी कम थी और संक्रमण का खतरा भी इतना नहीं था। अब देखिए, हमारे गांव इस महामारी से कैसे बच पाते हैं। ट्रेनों में सैनिटाइज बाबत जब रेलवे के पीआरओ राजेश बाजपेई से पूछा तो वे मौन हो गए।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें