कैंप के चारों तरफ कई फुट चौड़ी खाई खोदी जाती है। उसके बाद कंटीली तार लगाते हैं। अगर मौसम खराब है तो भी जवान इस काम को तय समय सीमा में ही पूरा करते हैं। दूसरा चरण टैंट लगाने का होता है। कुछ दिनों बाद पोटा केबिन बनते हैं। नक्सलियों के चलते आसपास की सड़कें पहले से ही क्षतिग्रस्त रहती हैं, ऐसे में जरुरत का सामान भी सीआरपीएफ व दूसरे सुरक्षा बलों के जवान ही कैंप तक ले जाते हैं।
बरसात में राशन, डीजल या गैस सिलेंडर, कई फुट पानी और दलदल में मैस तक यह सप्लाई जवानों द्वारा ही की जाती है। 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' तैयार होने के दौरान, सीआरपीएफ अधिकारी और जवान, ग्रामीणों का हाल जानने के लिए उनके पास पहुंचते हैं। उन्हें जरुरत का सामान मुहैया कराते हैं।
इस बीच जवानों को आवश्यक कार्य से छुट्टी जाना पड़े तो संसाधनों के अभाव में उन्हें अपनी लीव आगे बढ़ानी पड़ती है। वजह, सड़कें टूटी हुई होती हैं या नक्सलियों द्वारा उन्हें बीच से काट दिया जाता है। ऐसे में वहां से गाड़ी या बाइक नहीं गुजर सकती। जवानों को अपनी राशन सप्लाई के लिए खुद ही सड़क को ठीक करना पड़ता है।
एफओबी के चक्रव्यूह में फंसकर नक्सली मारे जा रहे हैं। नक्सलियों के गढ़ में अभी तक लगभग 300 से ज्यादा 'एफओबी' स्थापित किए जा चुके हैं। 2024 में 58 नए कैंप स्थापित हुए थे। इस वर्ष 100 नए एफओबी स्थापित करने पर काम शुरु हो हुआ था। ये कैंप नक्सल के किले को ढहाने में आखिरी किल साबित हो रहे हैं। जिस तेजी से 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित हो रहे हैं, उससे यह बात साफ है कि तय अवधि से पहले ही नक्सलवाद को खत्म कर दिया जाएगा।