दिल्ली पुलिस और इसके कप्तान यानी पुलिस आयुक्त को दूसरे राज्यों के मुकाबले ज्यादा ताकतवर माना जाता है। देश की आईपीएस लॉबी में भी दिल्ली पुलिस आयुक्त का खास दबदबा रहा है। मगर दिल्ली में पिछले कुछ माह से जो घटनाएं हो रही हैं, उससे दिल्ली पुलिस आयुक्त और पुलिस बल को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं।
पहला, क्या दिल्ली पुलिस को जानबूझकर कमजोर बनाया जा रहा है? दूसरा, सही समय पर पुलिस के हाथ क्यों बांध दिए जाते हैं? जामिया, जेएनयू, तीस हजारी, शाहीन बाग की घटना और अब दिल्ली के आधा दर्जन इलाकों में हुई खूनी हिंसा ने दिल्ली पुलिस पर सवालिया निशान लगा दिया है। गृह मंत्रालय में सामने के गेट से प्रवेश करने वाले मौजूदा पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक मंगलवार को चुपके से पीछे वाले गेट से अंदर आए और बैठक खत्म होने के बाद उसी गेट से बाहर निकल गए।
इससे पहले दिल्ली पुलिस आयुक्त, केंद्रीय गृह मंत्रालय में चार नंबर गेट से अंदर आते रहे हैं।बाद में इसी गेट से बाहर निकलते थे। मंगलवार को गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली की हिंसा को लेकर बैठक बुलाई थी।
इसमें उप राज्यपाल अनिल बैजल, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, भाजपा के दिल्ली प्रदेशाध्यक्ष मनोज तिवारी और कांग्रेस नेता सुभाष चोपड़ा के अलावा गृह सचिव अजय भल्ला व आईबी चीफ अरविंद कुमार सहित कई अधिकारी उपस्थित रहे। ये सभी लोग चार नंबर गेट से ही अंदर आए थे।
सिर्फ दिल्ली पुलिस आयुक्त ही ऐसे शख्स रहे, जो पीछे वाले छह नंबर गेट से अंदर आए और वहीं से वापस चले गए। बाकायदा गृह मंत्रालय में भी यह चर्चा का विषय रहा। दिल्ली पुलिस में लम्बे समय तक अपनी सेवाएं देने वाले एक अधिकारी का कहना है कि कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिसमें पुलिस को दम दिखाना पड़ता है। वहां आप केवल बातचीत से आगे नहीं बढ़ सकते।
पिछले साल अर्धसैनिक बल से रिटायर हुए इस अधिकारी ने कहा कि पहले जेएनयू की घटना होती है। उसके बाद तीस हजारी का कांड सामने आता है। दुनिया ने देखा कि किस तरह से दिल्ली पुलिस के साथ अभद्रता की गई। पुलिस अधिकारियों को पीटे जाने के वीडियो वायरल हुए।
पूर्व अधिकारी के मुताबिक, ऐसा नहीं है कि उत्तर पूर्व जिले में हो रही हिंसा जैसे हालात पहली बार हुए हैं। पहले भी इस तरह की घटनाएं हुई हैं, लेकिन दिल्ली पुलिस ने अपनी समझदारी से हालात को बिगड़ने से रोक दिया। ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए केवल निचले स्तर के अधिकारियों या कर्मियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसमें ऊंचे ओहदे पर बैठे अधिकारियों पर बहुत कुछ निर्भर करता है।
उन्होंने कहा कि वे कैसा आदेश देते हैं, कब देते हैं और कितनी मात्रा में समय रहते अतिरिक्त सुरक्षा बलों की मांग करते हैं, ये सब कानून व्यवस्था की स्थिति से निपटने में सबसे अहम कड़ी मानी जाती है। अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव कितना है, ये भी देखा जाता है। हाथ बंधे हैं तो पर्याप्त पुलिस बल होते हुए भी उपद्रवियों को नहीं रोका जा सकता।
पूर्व अधिकारी ने कहा कि पुलिस को संयम बरतने के साथ अगर छूट मिलती है तो दिल्ली की हिंसा जैसी घटनाओं पर काबू पाया जा सकता है। आप ही देखिये, तीस हजारी कांड हुआ तो दिल्ली पुलिस के जवान पुलिस मुख्यालय पर एकत्रित हो गए। वहां नारेबाजी होने लगी। यहां तक कि जवानों ने ऐसे नारे भी लगाए कि हमारा सीपी कैसा हो, किरण बेदी और दीपक मिश्रा जैसा हो। मौजूदा पुलिस आयुक्त के सामने ये नारे किस स्थिति में लगते हैं, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि अब यह दिल्ली पुलिस आयुक्त को तय करना है कि वह बिना किसी बाहरी दबाव के अपने जवानों के साथ मिलकर आगे बढ़ते हैं या ऊपर के आदेशों से किसी घटना पर काबू पाने का प्रयास करते हैं। जामिया, जेएनयू, तीस हजारी, शाहीन बाग और अब दिल्ली के आधा दर्जन इलाकों में हुई हिंसा में 56 पुलिसकर्मी घायल हो जाते हैं। दो आईपीएस अफसरों को चोट लगी है। हिंसा में 130 लोग भी घायल हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दिल्ली में होने के बावजूद इस तरह का दंगा होना, कहीं न कहीं पुलिस के आला अधिकारियों की कार्यशैली पर सवालिया निशान तो लगाता ही है।