नगर निगमों के बुलडोजर से अवैध इमारतें गिराने में व्यस्त हैं, इसी बीच नगर निगम अधिकारियों के भ्रष्टाचार का ऐसा दुखद प्रमाण सामने आया है, जिसके कारण दिल्ली के 27 परिवारों में हमेशा-हमेशा के लिए अंधेरा छा गया। दिल्ली के मुंडका इलाके में एक चार मंजिला इमारत में शुक्रवार शाम आग लगने से 27 लोगों की मौत हो गई। इसी प्रकार करोलबाग के अर्पित पैलेस अग्निकांड में 17 लोगों की और अनाज मंडी अग्निकांड में 43 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी।
हाल के वर्षों में दिल्ली की अनाज मंडी में सबसे भयानक अग्निकांड आठ दिसंबर 2019 को हुआ था। इस इमारत में बैग, जूते, बेल्ट बनाने जैसे छोटे-छोटे काम हुआ करता था। काम करने के बाद मजदूर उसी इमारत की ऊपरी मंजिल पर खा-पीकर सो जाते थे। घटना वाली रात भी सभी श्रमिक अपना-अपना काम करके सो गए थे, जो उनकी जिंदगी की आखिरी रात साबित हुई। इमारत की पहली मंजिल पर आग लगी और मजूदूर इससे बचने के लिए ऊपर की मंजिल की ओर भागे। इमारत से बाहर निकलने का केवल एक ही रास्ता था और आग उसी के आसपास लगी हुई थी।
चूंकि इमारत में बैग-बेल्ट बनाने का काम होता था, इमारत में इसके निर्माण में काम आने वाले प्लास्टिक, पेपर का सामान काफी मात्रा में रखा हुआ थे। आग धधकने के साथ इन सामानों में तेजी से आग लगी और आग फैलती गई। प्लास्टिक में आग लगने से खतरनाक गैसें निकलने लगीं और ऊपरी मंजिल पर फंसे श्रमिकों का दम घुटने लगा। इमारत की ऊपरी मंजिल पर ताला बंद था और बाहर छत की तरफ निकलने का भी कोई रास्ता नहीं था। मजदूरों ने खिड़कियों को तोड़ने की कोशिश जरूर की थी, लेकिन उन पर लोहे की रॉड लगी होने के नाते वे उन्हें नहीं तोड़ पाए।
घटना के बाद जांच में सामने आया था कि सबसे ज्यादा श्रमिकों की मौत दम घुटने से हुई थी। यदि ऊपरी मंजिल से छत पर जाने का दरवाजा बंद न होता, यदि आपातकालीन घटना के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता होता तो इन लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
करोलबाग के अर्पित होटल अग्निकांड (12 फरवरी 2019) में भी यही लापरवाही सामने आई थी। होटल की ऊपरी मंजिल पर खाना बनाने की व्यवस्था थी। नियमतः इस तरह के भवनों में भोजन बनाने के लिए अलग से व्यवस्था होनी चाहिए, जहां सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम होने चाहिए। बताया जाता है कि इस होटल में आग लगने की स्थिति में इससे निपटने की कोई व्यवस्था तक नहीं थी। होटल की ऊपरी मंजिल में आग लगी और अचानक ही नीचे तक पहुंच गई। होटल में बाहर निकलने का केवल एक ही रास्ता था, लेकिन आग लगने के बाद उससे होकर कोई बाहर नहीं निकल पाया।
बचने के लिए लोग ऊपरी मंजिल से चद्दरों के साथ नीचे उतरकर या कूदकर अपनी जान बचाने की कोशिश करने लगे, लेकिन इनमें से ज्यादातर की मौत हो गई। होटल में एक रस्से तक की व्यवस्था नहीं थी, जिसे पकड़कर लोग नीचे आ सकते और अपनी जान बचा सकते। इस कारण एक-एक कर लोगों की जान जाती रही।
आग लगने की सूचना मिलने के बाद दमकल विभाग की जो गाड़ियां मौके पर पहुंचीं, उन्हें वहां पहुंचने में भी ज्यादा समय लगा क्योंकि मुख्य मार्ग से घटनास्थल तक जाने के मार्ग के लिए उपयुक्त जगह पर कोई कट नहीं था। बात यहीं पर खत्म नहीं हुई, घटनास्थल पर पहुंचीं दमकल विभाग की गाड़ियों के पास इतनी ऊंची सीढ़ियां तक नहीं थीं, जो होटल की ऊपरी मंजिल तक पहुंच सकतीं और लोगों की जान बचा पातीं। जब तक पूरा इंतजाम हो पाता, 17 लोगों की जान जा चुकी थी।
मुंडका अग्निकांड में भी वही लापरवाही सामने आ रही है जो दिल्ली के अन्य अग्निकांडों में देखी गई थी। कुछ प्रमुख कारण जो अब तक सामने आ चुके हैं, इस प्रकार हैं-
इस समय नगर निगम अपने बुलडोजर से दिल्ली के अवैध इलाकों में लगातार तोड़फोड़ की कार्रवाई कर रहा है। इसका पुरजोर विरोध भी हो रहा है क्योंकि एक वर्ग का आरोप है कि बुलडोजर के बहाने राजनीति की जा रही है, एक वर्ग विशेष को निशाना बनाया जा रहा है। यदि नगर निगम अपने भ्रष्टाचार को समाप्त कर पाता, वह राजनीतिक कार्रवाई करने की बजाय लोगों के हित को प्राथमिकता देते हुए कार्य कर पाता, तो शायद ऐसे हादसों में अपनी जान गंवाने वाले लोगों की जिंदगी बच सकती थी। लेकिन अभी तक का इतिहास लोगों को इस बात के लिए आश्वस्त नहीं करता कि ऐसी कोई घटना फिर नहीं घटेगी।