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दिल्ली मेट्रो ने नेवी अफसर के पिता का जीना किया मुश्किल

Thu, 16 Feb 2017 07:14 PM IST
अमित कुमार निरंजन, नई दिल्ली
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- फोटो : amar ujala
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दिल्ली मेट्रो बहुतों के लिए राहत तो कुछ के लिए आफत लेकर आई। आफत ऐसी कि एक नेवी अफसर के पिता का  घर हमेशा शोर से गूंजता रहता है। हर मिनट पर आती-जाती मेट्रो से घर की दरखतों से लेकर दरवाजे तक हिलते हैं। घर के आसपास हो रहे बेइंतहा शोर से 95 वर्षीय बुजुर्ग को अपना बुढ़ापा काटना तब और मुश्किल हो जाता है जब ये तमाम बीमारियों से घिरे हों।
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यह मामला दिल्ली के कैलाश कॉलोनी का है, जहां मेट्रो स्टेशन 2010 में बना। इलाके में मैट्रो आई लेकिन शोर भी साथ खिंचा चला आया। इनकी परेशानी कम करने में न आरटीआई काम आया और न ही सूचना आयोग का आदेश।

95 साल के बुजुर्ग एल आर गोयला अपने बेटे अरुण जिंदल की मदद से सूचना आयोग में अपने घर में शांति से रहने की लड़ाई लड़ रहे हैं। कैलाश कॉलोनी  में रहने वाले गोयला के अपने 17 वर्षीय पोते शौर्य और बहु के साथ रहते हैं।  कैप्टन अरुण जिंदल भारतीय नेवी के क्वालिटी असोरेंश ऑफिसर के पद पर दिल्ली से दूर कार्यरत हैं।
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पॉश इलाके में बना यह घर इन सभी के लिए खासकर गोयला के लिए परेशानी का सबब बन गया है। क्योंकि इनके चिकित्सक ने इनको शोर से दूर रहने को कहा है। लेकिन घर के ठीक ऊपर बने मेट्रो स्टेशन के कारण यह शोर साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है।

अमर उजाला संवाददाता ने मौके पर जाकर हालात का जायजा लिया। मेट्रो स्टेशन बनने से इनके घर के ठीक बाहर हाथ रिक्शवालों का जमावड़ा होता है। जो मुख्य रोड के ट्रैफिक को प्रभावित करता है जिस कारण जमकर हॉर्न बजते रहते हैं। अपने पिता को शोर को बचाने के लिए अरुण ने हजारों रुपए खर्च कर घर में साऊंड प्रूफ ग्लास लगाए हैं। इसके बावजूद शोर आखिरी कोने तक पहुंचता है।
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सूचना आयुक्त ने किया था दौरा 

- फोटो : file photo
जब हर मिनट पर मेट्रो ट्रेन आती जाती है तब उसके गेट खुलने की आवाज इनके घर के कमरे से साफ सुनी जाती है। यही नहीं जब मेट्रो ट्रेन प्लेटफॉर्म पर प्रवेश करती है तब घर में कंपन साफ महसूस किया जा सकता है। नासूर बनते जाते जा रहे इस शोर के बारे में  बताया कि इसने बुढ़ापे में तन और मन को और जर्जर कर दिया।

गोयला के मुताबिक उन्होंने अपने बेटे की मदद से पहले तो शिकायत डीएमआरसी और मंत्रालयों में की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने 2011 से करीब 800 से ज्यादा आरटीआई आवेदन लगाए। उन्होंने ध्वनि प्रदूषण नाप, मेट्रो गाइडलाइन, ट्रैफिक नियम से संबंधित अर्बन मिनिस्ट्री, दिल्ली अर्बन आर्ट कमीशन, डीएमआरसी, डायरेक्टर एन्वायरमेंट गर्वन्मेंट ऑफ दिल्ली जैसे कई करीब दो दर्जन विभागों से आरटीआई आवेदन से जानकारी निकलवाई। जिन-जिन विभागों ने आनाकानी की तो अरुण की मदद से गोयला ने दूसरी अपील के माध्यम से केन्द्रीय सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया। 

आरटीआई दस्तावेजों के मुताबिक उस इलाके में ध्वनि प्रदूषण 84 डीबीआई तक था। जबकि मेट्रो की गाइडलाइन के तहत उन्होंने दिन में 55 डीबीआई और रात में 45 डीबीआई से ज्यादा ध्वनि प्रदूषण का स्तर पार नहीं करना चाहिए। चूंकि रात में भी मेट्रो स्टेशन पर मेंटीनेंस और ट्रेन का ट्रायल रन होता रहता है इस कारण रात में भी इनके घर पर शोर बेइंतहा होता रहता है। इसके अलावा ट्रैफिक पुलिस ने आरटीआई में हाथ रिक्शा को व्यवस्थित करने में असमर्थता जाहिर की। 

सूचना आयुक्त ने किया था दौरा 

शायद यह केन्द्रीय सूचना आयोग के इतिहास यह पहला मामला होगा, जब किसी सूचना आयुक्त ने जानकारी दिलवाने के लिए मौके पर निरीक्षण किया। सूचना आयुक्त प्रोफेसर श्रीधर आचार्युलु ने कैलाश कॉलोनी जाकर खुद इस शोर को महसूस किया और अरुण के पिता की परेशानी समझी। इसके बाद ही उन्होंने दिल्ली प्रशासन और मेट्रो को जानकारी देने का आदेश दिया।
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