केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि दिल्ली सरकार खुद को पीड़ित बताकर सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर रही है। दिल्ली न तो राज्य और न ही राज्य सरकार। केंद्र ने दिल्ली सरकार के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया कि उसे काम नहीं करने दिया जा रहा।
हकीकत यह है कि पिछले तीन वर्षों में 650 फाइलों में से सिर्फ तीन फाइलों को ही राष्ट्रपति के पास भेजा गया बाकी सभी का निपटारा कर दिया गया। दिल्ली बनाम उपराज्यपाल मामले में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ के समक्ष केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) मनिंदर सिंह ने बहस की शुरुआत करते हुए कहा, दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है।
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दिल्ली न तो राज्य है और न ही राज्य सरकार। दिल्ली को राज्य बनाने के लिए कई बार प्रस्ताव भेजा गया लेकिन संविधान निर्माताओं ने इसे नकार दिया। विधानसभा होने का यह मतलब यह नहीं है कि दिल्ली राज्य है और उसे दूसरे राज्यों की तरह अधिकार प्राप्त है। मनिंदर सिंह ने कहा कि जो चीज संविधान में ही नहीं है उसके लिए बहस करना संविधान के प्रावधानों के विपरीत है।
उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार की दलील है कि वह दिल्ली को राज्य का दर्जा नहीं मांग रही है लेकिन उसे राज्य सरकार वाले अधिकार चाहिए। सिंह ने कहा कि दिल्ली सरकार को संविधान में कार्यकारी अधिकारों में प्रमुखता नहीं दी गई है और न ही ऐसा सोचा गया है। अगर ऐसा हुआ तो अराजकता फैल जाएगी। यहां निगम के जरिये लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार दिए गए हैं और वह ही रोजमर्रा के कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं।