आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल चुनाव हार गए हैं। उनकी पार्टी के कई बड़े चेहरे भी परास्त हुए हैं। करीब डेढ़ दशक पहले अन्ना हजारे के जन लोकपाल आंदोलन से निकलकर सियासत में कदम रखने वाले केजरीवाल ने कहा था, राजनीति कीचड़ है। इसे साफ करने के लिए राजनीति में उतरना ही होगा। अब वही केजरीवाल चुनाव हार गए हैं। 2012 में केजरीवाल की अपील पर अमेरिका के शिकागो से दिल्ली आए डॉ. मुनीष रायजादा बताते हैं, अब दिल्ली के चक्रव्यूह में फंस चुका है 'अन्ना' का 'शिष्य' केजरीवाल। वे 'हजारे' की राह से बहुत दूर निकल चुके थे। आज कहां पर है जन लोकपाल। क्या उन्होंने राजनीति की कीचड़ साफ कर दिया है। चंदे में पारदर्शिता का मुद्दा तो कहीं पर गायब ही हो चुका है। 'आप' और दूसरे दलों में आज क्या फर्क रह गया है।
बता दें कि डॉ. मुनीष रायजादा ने भी नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन वे हार गए हैं। डॉ. रायजादा उन गिने चुने लोगों में से थे, जो विदेश में अपनी अच्छी खासी जॉब छोड़कर दिल्ली आ गए थे। उन्होंने 'आप' के साथ एनआरआई समुदाय को जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। विदेशों में रहने वाले हजारों भारतीयों से फोन कॉल के जरिए दिल्ली में 'आप' का चुनाव प्रचार कराया। उन्होंने पार्टी के लिए चंदा जुटाने में भी मदद की थी। 2015 के चुनाव के बाद पार्टी के कई बड़े चेहरे, जिनमें संस्थापक सदस्य भी शामिल थे, उन्हें पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था।
बतौर डॉ. मुनीष, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, प्रो. आनंद कुमार, अजीत झा और दूसरे कई नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। कुमार विश्वास भी पार्टी से बाहर कर दिए गए। उसी वक्त डॉ. मुनीष ने भी केजरीवाल से दूरी बना ली थी। डॉ. मुनीष ने बताया, देखिये बड़ी स्पष्ट बात है। अन्ना हजारे के आंदोलन का आधार 'क्रप्शन' के खिलाफ लड़ाई थी। जन लोकपाल का गठन कराना था। क्या दिल्ली में जन लोकपाल आ गया है।
केजरीवाल ने वे सभी बातें पीछे छोड़ दी। उन्हें 'फ्री' सेवा देने का सहारा क्यों लेना पड़ा। पार्टी के गठन के कुछ वर्ष बाद चंदे की वेबसाइट बंद कर दी गई। पहले कोई एक रुपया या दस लाख रुपये देता था तो वह जानकारी चंदे की वेबसाइट पर रहती थी। एकाएक उसे बंद कर दिया गया। डॉ. मुनीष कहते हैं, इसके खिलाफ आंदोलन किया गया। चंदे की जानकारी छिपाना, खुद को दूसरी राजनीतिक पार्टियों में खड़ा करने के समान था। इससे राजनीति में सुचिता कहां बची। जैसे दूसरी पार्टियां चंदे की जानकारी को छिपाती थी, वैसे ही 'आप' ने छिपा ली।
केजरीवाल के पूर्व सहयोगी रहे डॉ. मुनीष ने बताया, आम आदमी पार्टी ने लोगों का भरोसा तोड़ा है। पार्टी नेताओं ने अन्ना हजारे को भी धोखा दिया है। उनके मूल्यों और सिद्धांतों से खिलवाड़ किया है। इसी का नतीजा है कि अब उसी दिल्ली ने केजरीवाल को हरा दिया है। आगे क्या होगा, इस सवाल के जवाब में डॉ. मुनीष ने कहा, अगर केजरीवाल अब भी अन्ना मूवमेंट वाले आधार पर लौटते हैं तो वे दोबारा से खड़े हो सकते हैं। ये लोग अब नहीं सुधरे तो सियासत से पूरी तरह आउट हो जाएंगे। दिल्ली की हार, इनके लिए एक सबक है। इन लोगों ने उस विचार को त्याग दिया, जिसके बलबूते ये सियासत में आ गए थे। केजरीवाल समेत कई नेताओं को भ्रष्टाचार में जेल जाना पड़ा।
अब इन्हें दोबारा से अन्ना के विचारों को इन्हें जीवित करना होगा। संभव है कि आने वाले समय में 'आप' के भीतर उथल पुथल नजर आए। पार्टी में दूसरी और तीसरी लाइन के नेता बोलेंगे। इस हार का असर पंजाब में भी देखने को मिल सकता है। जब पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक हार जाए तो उसकी यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि उसे फौरन पार्टी के संयोजक का पद छोड़ देना चाहिए।