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सुप्रीम कोर्ट: दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के विस्तार को चुनौती वाली याचिका पर नोटिस जारी करने से इनकार, जानें पूरा मामला

Fri, 08 Apr 2022 10:32 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

एनजीओ सिटीजन फॉर ग्रीन दून ने एनजीटी के आदेश के खिलाफ अपील दायर की है। एनजीओ ने दिल्ली से देहरादून तक राष्ट्रीय राजमार्ग -72 के सुधार और विस्तार के लिए दी गई स्टेज- ढ्ढ वन मंजूरी और वन्यजीव मंजूरी को चुनौती दी थी।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के विस्तार को चुनौती देने वाली सिटीजन्स फॉर ग्रीन दून की याचिका पर नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया। हालांकि शीर्ष अदालत ने कहा कि सोमवार को वह इस बात पर विचार करेगी कि क्या राष्ट्रीय हरित अधिकरण(एनजीटी) द्वारा गठित 12 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति में एक गैर-सरकारी सदस्य/संगठन को नियुक्त किया जा सकता है?

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एनजीओ सिटीजन फॉर ग्रीन दून ने एनजीटी के आदेश के खिलाफ अपील दायर की है। एनजीओ ने दिल्ली से देहरादून तक राष्ट्रीय राजमार्ग -72 के सुधार और विस्तार के लिए दी गई स्टेज- ढ्ढ वन मंजूरी और वन्यजीव मंजूरी को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2021 में दिल्ली से देहरादून तक (राष्ट्रीय राजमार्ग -72) के सुधार और विस्तार के लिए पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी थी और जबकि एनजीटी को उक्त कार्रवाई पर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया था।

सिटीजन फॉर ग्रीन दून द्वारा दायर मूल आवेदन को खारिज करने के एनजीटी के आदेश के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि सुप्रीम कोर्ट को अपील में एनजीटी के बहुत असंतोषजनक आदेश पढ़ने को मिलते हैं और ट्रिब्यूनल को अपना दिमाग लगाना चाहिए। मामले को वापस भेजे जाने पर, दिसंबर 2021 में एनजीटी ने परियोजना को आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी। 
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एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि हमें यह मानना मुश्किल लगता है कि पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा मंजूरी देने के लिए कोई दिमागी कसरत नहीं की गई थी। एनजीटी ने परियोजना के पर्यावरणीय पहलू को देखने के लिए 12 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का भी गठन किया था।

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एनजीओ की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ऋत्विक दत्ता ने कहा कि गैर वन उद्देश्य के लिए वन भूमि के डायवर्सन के पहलू को पारिस्थितिक लागत के साथ देखा जाना चाहिए और इसके निरीक्षण की आवश्यकता है।
अदालत ने हालांकि एनजीओ को एनजीटी द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत करने को कहा। तब दत्ता ने कहा कि विशेषज्ञ समिति के सभी सदस्य किसी न किसी रूप से या तो राज्यों से जुड़े हैं या केंद्र से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि समिति में एक व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जो सरकार से नहीं हो।

अदालत ने इस बिंदु पर कोर्ट रूम में मौजूद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सुझाव मांगा। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि उनके पास इस मामले में निर्देश नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि किसी अधिकारी पर केवल इसलिए भरोसा नहीं करना कि वह एक सरकारी अधिकारी है, यह सही दृष्टिकोण नहीं है। जो सरकार से नहीं है उसकी अपनी धारणा हो सकती है और उन्हें इस मुद्दे पर जमीनी स्तर की जानकारी नहीं हो सकती है। कृपया इसे मुख्य सचिव पर छोड़ दें।

शीर्ष अदालत ने हालांकि महसूस किया कि एनजीओ के सुझाव पर विचार करने की जरूरत है। अदालत ने सॉलिसिटर जनरल और दत्ता को नामों की एक सूची के साथ आने को कहा है। अगली सुनवाई 11 अप्रैल को होगी।

आप शराब के नशे में चूर ड्यूटी नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
एक अन्य मामले में शराब पीकर ड्यूटी करने वाले सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) जवान को नौकरी से हटाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा, आपने स्वीकार किया है कि ड्यूटी के दौरान नशे में चूर रहते थे। आपका तर्क है कि विचलित होने के कारण आपने शराब पी थी। ऐसे में हम क्या कर सकते हैं। हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे। बीएसएफ जवान के वकील ने तर्क रखा कि उसे नौकरी से हटाते वक्त कई नियमों की अनदेखी की गई। साथ ही, शराब पीने के कारण नौकरी से हटाने का फैसला काफी कठोर है। पीठ ने कहा कि साफ तौर पर इसे कठोर ही होना चाहिए। बीएसएफ में ड्यूटी पर रहते आप शराब नहीं पी सकते। कुछ अपराध ऐसे हैं, जिनमें हम हस्तक्षेप करना पसंद नहीं करते।

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