दिल्ली में वर्ष 2019 की पुलिस और कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर एनजीओ प्रज्ञा फाउंडेशन ने कई सवाल उठाए हैं। फाउंडेशन की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि गंभीर अपराध के मामले में भी जांच समय पर नहीं पूरी की गई, वहीं किसी मामले में पुलिस ने चार्जशीट तक दाखिल नहीं की है। इसके अलावा संसद में जनप्रतिनिधियों ने भी महिला सुरक्षा के मुद्दे पर चार ही सवाल पूछे हैं । बच्चों के खिलाफ अपराध पर कोई भी सवाल नहीं पूछा गया है।
प्रज्ञा फाउंडेशन के संस्थापक निताई मेहता ने कहा कि, पुलिस सुधार के कार्यान्वयन पर उच्चतम न्यायालय के फैसले को 14 साल हो गए हैं। जैसे जांच—पड़ताल और कानून व्यवस्था के कार्यों को अलग करना था, जो यह सुनिश्चित करता कि पुलिस अधिकारी को ड्यूटी करने के लिए अपनी जांच पड़ताल नहीं छोड़नी पड़े। हालांकि दिल्ली पुलिस ने इसके लिए 2019 में काम करना शुरु किया था लेकिन अब तक इसे शहर में पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है।
फाउंडेशन के निदेशक मिलिंद म्हस्के ने कहा, 2019 में दिल्ली में आईपीसी के अंतर्गत कुल 3,10,983 मामलों में केवल 16 फीसदी केस में चार्जशीट दाखिल की गई। इसके अलावा 2019 में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध के 58 और बच्चों के खिलाफ अपराध के 55 फीसदी मामलों में जांच पूरी नहीं हुई। जांच में देरी के कारण न्याय में देरी होती है।
उन्होंने आगे बताया कि 2019 में दिल्ली की अदालतों में जिन 2,92,647 आईपीसी मामलों में सुनवाई होनी थी उनमें केवल 10 प्रतिशत मामलों में ही फैसला दिया गया। सही जांच पड़ताल का न होना कम सजा में परिलक्षित होती है। महिलाओं के खिलाफ अपराध के 59 प्रतिशत मामलों और बच्चों के खिलाफ अपराध के 38 प्रतिशत मामलों को 2019 में बरी या खारिज किया गया।
निदेशक म्हस्के के अनुसार, सालाना दिल्ली में पॉक्सो के तहत बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के एक हजार से ज्यादा मामले दर्ज होते हैं। वहीं पॉक्सो अदालतों में 10 प्रतिशत से कम सुनवाई हुई और फैसले दिए गए। 2019 में दिल्ली में पॉक्सो के तहत 1,719 बाल यौन शोषण के मामले दर्ज किए गए। इनमें 969 बलात्कार, 604 यौन हमला, 90 अप्राकृतिक अपराध और 50 यौन उत्पीड़न के केस है।
उन्होंने आगे बताया कि 2019 में 14,836 अपहरण किए गए व्यक्तियों में से केवल 35 प्रतिशत ही जीवित मिले हैं। ये आंकड़ा 2017 में 15,682 लोगों में से 48 प्रतिशत बरामद हुए लोगों से कम है।
वहीं, दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराध पर सांसदों द्वारा केवल 4 ही प्रश्न पूछे गए। बच्चों के खिलाफ अपराध पर एक भी प्रश्न नहीं पूछा गया है। जबकि दिल्ली में ये सबसे बड़ी समस्या है।
रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस के लिए चुनौतिपूर्ण पहलू यह है कि प्रणाली के भीतर काम कर रहे लोगों को जागरुक प्रशिक्षित व संवेदनशील बनाना। आज पीड़ित को एक निष्पक्ष और संवेदनशील पुलिस की जरुरत है।