दिल्ली के रानी झांसी रोड पर फिल्मिस्तान के नजदीक जिस इमारत में आग लगी है, उसे फायर विभाग से एनओसी नहीं मिला हुआ था। इमारत में आग से निबटने का कोई इंतजाम नहीं था। ज्यादातर लोगों की मौत आग में झुलसने के कारण नहीं, बल्कि तीसरी मंजिल पर बने एक बरामदे में धुएं से दम घुटने की वजह से हुई है।
दिल्ली अग्निशमन विभाग के उच्च अधिकारी अतुल गर्ग ने बताया कि जिस इमारत में आग लगी है, वह लगभग 500 गज पर बनी है। पूरी इमारत में ग्राउंड फ्लोर के अलावा चार मंजिल और बनी है। हर फ्लोर पर छोटे-बड़े कमरे बने हैं। हर कमरे में अलग-अलग प्रकार के सामान बनाने की फैक्ट्रियां चल रही थीं। वहां बैग, टोपी, पर्स जैसे सामान बनाए जाते थे। ग्राउंड फ्लोर के एक कोने में सीढ़ियां हैं जो ऊपर की मंजिलों के लिए जाती हैं। आग लगने की घटना दूसरी मंजिल पर हुई थी। सबसे ज्यादा लोगों की मौत तीसरी मंजिल पर बने एक बरामदे में दम घुटने के कारण हुई है।
सबसे ज्यादा मजदूर तीसरी मंजिल पर बने एक बरामदे में सोते थे, जबकि आग दूसरी मंजिल पर लगी है। आशंका है कि दूसरी मंजिल पर आग लगने के बाद मजदूरों को नीचे भागने का अवसर नहीं मिला होगा क्योंकि नीचे रखे फैक्ट्री के सामानों में आग लग गई होगी जिससे नीचे भागने का रास्ता ब्लॉक हो गया होगा। ऐसी स्थिति में सब ऊपर की तरफ भागे होंगे। वहां भी उन्हें बचने का कोई रास्ता नहीं मिला और लगातार ऊपर उठते धूएं में दम घुटने से उनकी दर्दनाक मौत हो गई।
अग्निशमन विभाग के एक जवान सोमेश के मुताबिक किसी भी फ्लोर के किसी भी कमरे में हवा-पानी की निकासी के लिए उचित खिड़की नहीं थी। कुछ जगहों पर छोटी-छोटी खिड़कियां बनीं थीं। उन्होंने खिड़कियों को तोड़कर लोगों को अपने कंधे पर रखकर बाहर निकाला। सोमेश के मुताबिक आग में बुरी तरह झुलसने के कारण किसी की जान नहीं गई है। सबसे ज्यादा लोगों की मौत दुम घुटने की वजह से हुई है। आग बुझाने के दौरान एक दमकल कर्मी के भी चोट लगने की बात सामने आई है। उसका इलाज चल रहा है।
फैक्ट्री की एरिया में एक ही द्वार अंदर जाने के लिए था। यहां से भी केवल एक ही वाहन एक बार में अंदर जा सकता है। जबकि इस एरिया से बाहर निकलने के लिए कोई रास्ता नहीं है। एक बहुत छोटा रास्ता बाहर निकलने के लिए है, लेकिन वहां से केवल पैदल यात्री ही बाहर निकल सकते हैं।
बांके बिहारी गेट से कुछ ही दूर पर मीट का कारोबार करने वाले इमरान ने बताया कि इस इलाके में सबसे ज्यादा यूपी-बिहार के मजदूर काम करते हैं। वे किराए इत्यादि की बचत के कारण अक्सर फैक्ट्रियों में ही सो जाते हैं। इसीलिए यहां मौत का आंकड़ा इतना ज्यादा है। हालांकि, दिल्ली के ही सीलमपुर, शास्त्री पार्क जैसी एरिया के लोग भी यहां काम करते हैं। इसलिए दिल्ली के लोगों के भी इनमें भारी संख्या में होने की आशंका है। ज्यादातर मजदूरों को यहां आठ से दस हजार रुपये तक की सैलरी मिलती है।