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रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर देश: डीआरडीओ ने दिखाईं स्वदेशी चिप तकनीकें, रडार-मिसाइलों को मिलेगी ताकत

Fri, 30 Oct 2026 11:10 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

डीआरडीओ ने स्वदेशी सेमीकंडक्टर चिप तकनीकों का प्रदर्शन किया है। इनका इस्तेमाल आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और सामरिक मिसाइलों में किया जा सकता है। आईआरएफपीए तकनीक मिसाइलों को लक्ष्य पहचानने में मदद करती है। इसके अलावा स्क्रैमजेट इंजन और क्वांटम तकनीक भी दिखाई गई। आखिर ये स्वदेशी चिप दुश्मन के खिलाफ भारत की रक्षा क्षमता कैसे बढ़ाएंगी? क्या इससे विदेशी तकनीक पर निर्भरता घटेगी? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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मिसाइलों की आंख बनेंगी भारत की स्वदेशी चिप डीआरडीओ ने दिखाईं कौन-कौन सी आधुनिक तकनीकें? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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भारत ने रक्षा तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक और अहम उपलब्धि दिखाई है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने ऐसी स्वदेशी चिप तकनीकों का प्रदर्शन किया है, जिनका इस्तेमाल आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और सामरिक मिसाइलों में किया जाता है। इन तकनीकों की मदद से दुश्मन के विमानों और अन्य लक्ष्यों का पता लगाने, उनकी गतिविधियों पर नजर रखने और मिसाइलों को सही निशाना साधने में मदद मिलती है। खास बात यह है कि इन तकनीकों को भारत में ही विकसित किया गया है। इससे रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करने की दिशा में मदद मिल सकती है।

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डीआरडीओ ने 27 से 29 अक्तूबर तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित इमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव 2026 में इन तकनीकों को प्रदर्शित किया। इस कार्यक्रम में संगठन की दिल्ली स्थित सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी (एसएसपीएल) की ओर से विकसित कई स्वदेशी सेमीकंडक्टर तकनीकें दिखाई गईं। इनमें मोनोलिथिक माइक्रोवेव इंटीग्रेटेड सर्किट (एमएमआईसी) और इन्फ्रारेड फोकल प्लेन ऐरे (आईआरएफपीए) शामिल हैं। ये छोटे लेकिन बेहद महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हैं। इनका इस्तेमाल आधुनिक रक्षा प्रणालियों में होता है। इनके अलावा डीआरडीओ ने स्क्रैमजेट इंजन, न्यूरोमॉर्फिक एक्सेलेरेटर और आधुनिक संचार प्रणालियों का भी प्रदर्शन किया।

रडार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली में कैसे काम आएंगी ये स्वदेशी चिप?
डीआरडीओ ने गैलियम आर्सेनाइड (GaAs) और गैलियम नाइट्राइड (GaN) से बनी एमएमआईसी तकनीक का प्रदर्शन किया। इसके साथ मल्टी-चिप मॉड्यूल (एमसीएम) भी दिखाए गए। इन तकनीकों का इस्तेमाल कई रणनीतिक अभियानों में किया जा चुका है। ये आधुनिक रडार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। आसान भाषा में समझें तो रडार की मदद से आसमान या जमीन पर मौजूद लक्ष्यों का पता लगाया जाता है। वहीं, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली दुश्मन के रडार और संचार उपकरणों को पहचानने, उनके संकेतों को समझने और जरूरत पड़ने पर उन्हें प्रभावित करने में मदद करती है। इन प्रणालियों को बेहतर बनाने में स्वदेशी चिप तकनीक अहम भूमिका निभाती है। इससे भारत को रक्षा उपकरणों के लिए जरूरी तकनीक देश में ही विकसित करने की क्षमता मिलती है।
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मिसाइलों की आंख कैसे बनती है आईआरएफपीए तकनीक?
डीआरडीओ ने इन्फ्रारेड फोकल प्लेन ऐरे यानी आईआरएफपीए तकनीक भी प्रदर्शित की। इसे सामरिक मिसाइलों की आंख कहा जा सकता है। यह तकनीक मिसाइल के इमेजिंग इन्फ्रारेड सीकर का हिस्सा होती है। इसकी मदद से मिसाइल अपने लक्ष्य को पहचानती है और अंतिम चरण में उसकी गतिविधियों पर नजर रखती है। जब मिसाइल लक्ष्य के करीब पहुंचती है, तब यह तकनीक उससे निकलने वाली गर्मी और इन्फ्रारेड संकेतों के आधार पर उसे पहचानने में मदद करती है। डीआरडीओ ने इस दौरान तीन तरह की इन्फ्रारेड तकनीकों का प्रदर्शन किया। इनमें शॉर्ट-वेव इन्फ्रारेड (एसडब्ल्यूआईआर), मिड-वेव इन्फ्रारेड (एमडब्ल्यूआईआर) और लॉन्ग-वेव इन्फ्रारेड (एलडब्ल्यूआईआर) शामिल हैं। इन तकनीकों का विकास भारत में उन्नत सेमीकंडक्टर क्षमता तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

डीआरडीओ ने चिप के अलावा किन आधुनिक तकनीकों का प्रदर्शन किया?
डीआरडीओ ने कॉन्क्लेव में केवल चिप तकनीक ही नहीं, बल्कि कई दूसरी आधुनिक प्रणालियां भी प्रदर्शित कीं। इनमें स्क्रैमजेट इंजन तकनीक शामिल है। इस तकनीक का इस्तेमाल हाइपरसोनिक गति से उड़ने वाले वाहनों के विकास में किया जा सकता है। इसके अलावा न्यूरोमॉर्फिक एक्सेलेरेटर भी दिखाया गया। यह ऐसी तकनीक है, जो कंप्यूटर को इंसानी दिमाग की कार्यप्रणाली से प्रेरित तरीके से जानकारी समझने और उसका विश्लेषण करने में मदद करती है। संगठन ने आधुनिक संचार प्रणाली, क्वांटम रैंडम नंबर जेनरेटर (क्यूआरएनजी), फोटोनिक इंटीग्रेटेड सर्किट (पीआईसी) और लेजर प्रॉक्सिमिटी सेंसर भी प्रदर्शित किए। इन तकनीकों का इस्तेमाल सुरक्षा, संचार और आधुनिक रक्षा प्रणालियों में किया जा सकता है।

सेमीकंडक्टर और अगली पीढ़ी की चिप पर क्या चर्चा हुई?
डीआरडीओ इस कॉन्क्लेव के प्रमुख आयोजकों में शामिल था। संगठन ने 'सेमीकंडक्टर और अगली पीढ़ी की चिप' विषय पर एक विशेष सत्र भी आयोजित किया। इसकी अध्यक्षता इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार प्रणाली के महानिदेशक तथा विशिष्ट वैज्ञानिक डॉ. बीके दास ने की। इस सत्र में सेमीकंडक्टर तकनीक के नए विकास पर चर्चा हुई। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के लिए विशेष चिप, सिलिकॉन चिप के स्तर पर काम करने वाली बुद्धिमान तकनीक और माइक्रोप्रोसेसर के बदलते स्वरूप जैसे मुद्दे शामिल थे। डीआरडीओ ने यह भी बताया कि वह अगली पीढ़ी की चिप डिजाइन और स्वदेशी तकनीक विकसित करने में उद्योगों और स्टार्टअप की मदद कर रहा है। इसका मकसद देश में चिप बनाने और विकसित करने की क्षमता को बढ़ाना है।

भारत में सेमीकंडक्टर तकनीक को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों जरूरी माना गया?
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, सेमीकंडक्टर तकनीक केवल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक सीमित नहीं है। यह देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक मजबूती और डिजिटल सुरक्षा से भी जुड़ी है। इसलिए चिप के डिजाइन से लेकर उसके निर्माण, जांच, बड़े स्तर पर उत्पादन और आपूर्ति व्यवस्था तक देश में क्षमता विकसित करना जरूरी है। भारत की कई रक्षा प्रयोगशालाएं और विशेष संस्थान इस दिशा में काम कर रहे हैं। इनमें सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी (एसएसपीएल), गैलियम आर्सेनाइड एनेबलिंग टेक्नोलॉजी सेंटर (जीएईटीईसी), सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी एंड एप्लाइड रिसर्च सेंटर (स्टार्क) और सेमीकंडक्टर लेबोरेटरी (एससीएल) शामिल हैं। इन संस्थानों ने गैलियम आर्सेनाइड, गैलियम नाइट्राइड, माइक्रो-इलेक्ट्रो-मैकेनिकल सिस्टम (एमईएमएस) और सिलिकॉन तकनीक के क्षेत्र में विशेषज्ञता विकसित की है। यह कॉन्क्लेव 'क्रिएटिव माइंड्स, कैटलाइजिंग साइंस, एम्पावरिंग सोसाइटी' विषय के तहत आयोजित हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया। इसे 12 मंत्रालयों और विभागों ने मिलकर आयोजित किया था।

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