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दिसंबर में खगोलीय महोत्सव: दो उल्कापात, सुपरमून और छह ग्रहों की जगमगाहट; खूबसूरत नजारों से सजेगा अंबर

Tue, 02 Dec 2025 06:08 AM IST
शिवम गर्ग गिरीश रंजन तिवारी

सार

दिसंबर 2025 में आसमान खगोलीय महोत्सव से खिलेगा। जेमिनिड और उर्सिड उल्कापात, साल का अंतिम सुपरमून, छह ग्रहों की परेड और कई दुर्लभ घटनाएं इस महीने को खास बनाएंगी। जानें पूरा खगोलीय कैलेंडर...
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आकाश में मनेगा खगोलीय महोत्सव - फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
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विस्तार
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दिसंबर 2025 का महीना खगोल विज्ञान प्रेमियों के लिए अनेक दुर्लभ और आकर्षक घटनाएं लेकर आ रहा है। यह महीना वर्ष के सबसे आकर्षक उल्कापात, सुपरमून, ग्रहों के विशेष संयोग और वर्ष की सबसे लंबी रातों का साक्षी बनेगा। दिसंबर भर आसमान में मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून और शुक्र एक साथ सिक्स-प्लैनेट परेड बनाते हुए दिखाई देंगे।

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यह खगोल प्रेमियों के लिए दुर्लभ और शानदार अवसर होगा। 4 दिसंबर को इस वर्ष का अंतिम सुपरमून, जिसे कोल्ड मून कहा जाता है, दिखाई देगा। इसी दिन बुध ग्रह भी अर्ध प्रकाशित स्थिति में आकर्षक नजर आएगा। 7 दिसंबर को बृहस्पति विपक्ष स्थिति में रहेगा। इससे यह पूरी रात बेहद चमकीला और स्पष्ट दिखाई देगा। इसी रात की अगली सुबह बुध ग्रह आसमान में अपनी सबसे ऊंची स्थिति में अत्यंत चमकदार दिखाई देगा। महीने का सबसे बड़ा आकर्षण 13 दिसंबर की रात को होने वाला जेमिनिड उल्कापात होगा। इस दौरान प्रति घंटे 100 से 120 तक उल्काएं दिखाई दे सकती हैं।

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खास बात यह है कि इस दौरान चंद्रमा अमावस्या की स्थिति में रहेगा जिससे गहरा अंधेरा रहेगा और दृश्यता सर्वोत्तम होगी। 21 दिसंबर को उत्तरी गोलार्ध में संक्रांति पर वर्ष का सबसे छोटा दिन और सबसे लंबी रात होगी। 22 दिसंबर को उर्सिड उल्कापात अपने चरम पर रहेगा जिसमें हर घंटे लगभग 10 से 15 उल्काएं दिख सकती हैं। 26 दिसंबर को चंद्रमा और शनि का विशेष संयोजन देखने को मिलेगा। दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब और बहुत ही आकर्षक दिखाई देंगे।
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दुर्लभ है जेमिनिड उल्कापात
जेमिनिड उल्कापात अन्य उल्कापातों के मुकाबले अलग और दुर्लभ है। इस दौरान बहुत सारी उल्काएं नजर आती हैं लेकिन अन्य उल्कापातों की तरह इसका स्रोत किसी धूमकेतु का मलबा नहीं बल्कि फैथॉन 3200 नाम का एक छोटा सा पिंड (क्षुद्रग्रह) है। खगोल विशेषज्ञ और एस्ट्रो फोटोग्राफर प्रमोद सिंह खाती के अनुसार लगभग पांच किमी आकार वाला यह पिंड सूर्य के चारों ओर 1.4 वर्ष में एक चक्कर लगाता है। सूर्य के निकट आने पर सूर्य की गर्मी से इससे धूल के कण निकल कर बिखर जाते हैं। जब पृथ्वी इन कणों के मार्ग से गुजरती है तो ये पृथ्वी के वायुमंडल के घर्षण से जल कर उल्का के रूप में नजर आते हैं।

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