सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को आए एक फैसले ने एक बार फिर आरक्षित वर्ग के भीतर क्रीमी लेयर की अवधारणा पर बहस को पुनर्जीवित कर दिया। इस फैसले में राज्यों को आरक्षित वर्ग के ऐसे समूहों को आरक्षण का लाभ देने के लिए अधिकृत किया गया है जो लाभ से वंचित थे।
बीते चार महीने में यह दूसरी बार है जब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने परोक्ष रूप से यह बात कही है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग में भी क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू होना चाहिए। जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने साफ तौर पर कहा कि आरक्षण का लाभ सिर्फ और सिर्फ उन लोगों को नहीं मिलना चाहिए जो वर्षों से इसका लाभ लेते आ रहे हैं।
पीठ ने कहा, आरक्षित वर्ग के भीतर भी ऐसे कई उप वर्ग हैं जिन्हें आरक्षण का लाभ प्राप्त नहीं हो पा रहा है और हमें यह समझने की जरूरत है। पीठ ने कहा, आरक्षण का असल उद्देश्य है कि वंचित लोगों को इसका लाभ प्राप्त हो, यह कतई नहीं है कि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक ही सीमित हो जो संपन्न हों।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामाजिक बदलाव में संविधान प्रभावी उपकरण है। इसका मूल सिद्धांत ही यह है कि सभी की आंखों से आंसू खत्म किए जाएं। आरक्षण का मकसद ही असमानता को खत्म करना है। पीठ ने कहा, यह राज्य सरकार का दायित्व है कि वह समुदाय के वंचित लोगों की पहचान करें और असमानता को दूर करें। जब आरक्षित वर्गों के अंदर ही आरक्षण में असमानता हो तो सरकार को उप वर्ग बनाकर ऐसे वंचित लोगों तक लाभ पहुंचाना चाहिए।
निचले पायदानों तक लाभ पहुंचाना एक सपना जैसा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, एससी-एसटी और सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के भीतर असमानता है। कई रिपोर्ट भी इस ओर इशारा करती हैं। इसमें भी कई संपन्न हैं और कई वंचित। निचले पायदानों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाना एक सपना सा रह गया है।
अप्रैल में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण का लाभ उन ‘महानुभावों’ के वारिसों को नही मिलना चाहिए जो 70 वर्षों से आरक्षण का लाभ उठा धनाड्यों की श्रेणी में आ चुके हैं। कोर्ट ने तब कहा था कि सरकार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों की सूची फिर से बनानी चाहिए। वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि एससी एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर का कोई प्रमाण नहीं है। साफ है कि आने वाले दिनों में यह मामला तूल पकड़ सकता है।