अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद भारत मां के ऐसे वीर सपूत थे जिनकी अस्थि भस्म लेने के लिए भी युवाओं में होड़ मची थी। आजाद ने जहां पर अंतिम सांस ली थी वहां की मिट्टी और उनका अस्थि भस्म लेने के लिए युवाओं में गजब का जोश था। आलम यह रहा कि वाराणसी में विसर्जित की जाने के लिए ले जाई जा रही आजाद की भस्म नाममात्र को ही बची।
दरअसल 27 फरवरी 1931 को आजाद की शहादत के बाद शहर में हड़ताल का माहौल हो गया। मिठाई, खोमचे और पानवालों तक ने अपना कारोबार बंद कर दिया। इक्के-तांगे भी नहीं चल रहे थे। विद्यार्थी संघ की ओर से शहर में घोषणा करा दी गई थी कि शाम पांच बजे ‘आजाद की अस्थिभस्म’ का जुलूस अभ्युदय प्रेस से उठेगा और पुरुषोत्तम दास पार्क में सभा होगी। फिर तो पुलिस ने जुलूस निकलने वाले सभी रास्तों को घेर लिया। शहर के दोनों ओर दस-दस कदम पर सशस्त्र पुलिस पहरा दे रही थी। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि जुलूस निकले। ऐसे में मिलेट्री बुला ली गई।
अगर जुलूस उठता तो गोलियां भी जरूर चलतीं। तब राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन प्रयाग में ही थे। उन्होंने सारी जिम्मेदारी ली। प्रेस से थोड़े से लोग नंगे सिर और नंगे पांव फूलों से सजी अस्थि चौकी को अपने कंधों पर रखकर आगे बढ़े। शुरुआत में तो कम लोग थे लेकिन पार्क पहुंचते-पहुंचते काफिला लंबा हो गया। पार्क में पहले से ही भीड़ मौजूद थी। जैसे ही सभा कार्रवाई शुरू हुई, तभी क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल की पत्नी पहुंच गई।
उन्होंने मंच पर पहुंचकर बस इतना ही कहा, खुदीराम बोस की भस्म को लोगों ने ताबीज में रखकर अपने बच्चों को पहनाया था कि बच्चे भी उनकी तरह बहादुर देशभक्त बने। मैं उसी भावना से भाई आजाद की चुटकी भर राख लेने आयी हूं। उनकी इन पंक्तियों को सुनने के बाद तो जनता जोश में आ गई। इसके बाद तो अस्थिभस्म लेने की होड़ मच गई। बड़ी मुश्किल से भस्म का अंश काशी ले जाने के लिए बचाया जा सका।
आजाद तथा भगत सिंह में लगी थी शहादत की शर्त
भगत सिंह
भारत मां के दो वीर सपूत भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के बीच गहरी दोस्ती थी। एक ने फांसी के फंदे को चूम कर उसे गले लगाया तो वहीं दूसरे ने अंग्रेजों के हाथ में आने से पहले ही खुद को खत्म कर लिया। दोनों के बीच गहरा याराना था। दोनों के बीच इस बात की भी शर्त लगती थी कि भारत मां को अंग्रेजी दास्तां से मुक्त कराने के लिए कौन पहले शहीद होगा। जब भी दोनों साथ होते, उनके बीच इस पर चर्चा होती। भगत सिंह जब जेल में थे तो आजाद ने उन्हें छुड़ाने के लिए जीतोड़ कोशिश की थी।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो.हेरंब चतुर्वेदी बताते हैं, भगत सिंह ने कहा था, ‘मेरा दोस्त बाजी मार ले गया।’ भगत सिंह की फांसी मिलने से पहले तक आजाद उन्हें छुड़ाने का प्रयास करते रहे। इसी सिलसिले में वह अकोला, झांसी आदि जिलों में भी घूमे । इस वक्त आजादी का आंदोलन थोड़ा कमजोर हो गया था। काफी संख्या में क्रांतिकारी शहीद हो चुके थे। रोशन सिंह, सहदेव, राजगुरु जैसे तेजतर्रार क्रांतिकारी जेल में थे। अगर आजाद शहीद न हुए होते और उन्होंने भगत सिंह को छुड़ा लिया होता तो स्वतंत्रता संग्राम की कहानी कुछ और ही होती।
देश-विदेश से संगमनगरी आने वाले पर्यटक संगम, आंनद भवन के बाद चंद्रशेखर आजाद का शहादत स्थल और इलाहाबाद संग्रहालय में रखी उनकी पिस्तौल को देखना नहीं भूलते हैं। इसी पिस्तौल से आजाद ने पार्क में अंग्रेजों से मुठभेड़ के दौरान खुद को गोली मार ली थी। संग्रहालय के निदेशक राजेश पुरोहित के मुताबिक यह पिस्तौल तीन जुलाई 1976 में इलाहाबाद संग्रहालय का हिस्सा बनी। संग्रहालय को यह पिस्तौल प्रदेश सरकार से मिली थी। यह 32 बोर की यूएस में बनी पिस्तौल है।