इंटरनेट आने के बाद पूरी दुनिया में एक क्रांतिकारी बदलाव आया है। आज के समय इंटरनेट पर हर दिन लाखों नई तस्वीरें, वीडियो, पोस्ट और जानकारियां साझा हो रही हैं। हालांकि, इस बीच एक सवाल तेजी से ध्यान खींच रहा है। क्या इंटरनेट पर होने वाली हर गतिविधि के पीछे कोई असली इंसान मौजूद है? इसको लेकर कई तकनीकी विशेषज्ञ एक खास तरह के नए सिद्धांत पर चर्चा कर रहे हैं, जिसे डेड इंटरनेट थ्योरी के नाम से जाना जाता है।
इस थ्योरी के मुताबिक इंटरनेट पर बॉट्स और ऑटोमेटेड अकाउंट्स की भूमिका लगातार बढ़ रही है। कई पोस्ट एआई की मदद से तैयार हो रही हैं और इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर फेक इंगेजमेंट और आर्टिफिशियल लोकप्रियता हासिल करने के लिए भी किया जा रहा है।
ऐसे में इंटरनेट पर सक्रियता तो दिखाई देती है, लेकिन उसके पीछे वास्तविक इंसानी भागीदारी कितनी है यह पहचानना अब मुश्किल होता जा रहा है। एआई और बॉट्स के बढ़ते इस्तेमाल ने ऑनलाइन दुनिया की विश्वसनीयता को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि डेड इंटरनेट थ्योरी आखिर क्या कहती है?
क्या है डेड इंटरनेट थ्योरी?
डेड इंटरनेट थ्योरी के मुताबिक, इंटरनेट पर इंसानों की असली गतिविधियों की जगह धीरे-धीरे एआई से तैयार कंटेंट और बॉट्स लेते जा रहे हैं। इस थ्योरी के अनुसार सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाले कई पोस्ट, कमेट और लाइक्स के पीछे वास्तविक लोग नहीं, बल्कि ऑटोमेटेड अकाउंट्स हो सकते हैं। इसके अलावा इंटरनेट पर एक जैसे कंटेंट की बढ़ती संख्या और एल्गोरिदम के जरिए लोगों की पसंद को प्रभावित करने की कोशिशें भी इस बहस का हिस्सा हैं। इस थ्योरी का दावा है कि इंटरनेट पर मौजूद बड़ी मात्रा में कंटेंट और सोशल मीडिया से जुड़ी गतिविधियां अब इंसानों के बजाय एआई मॉडल्स और बॉट्स के जरिए संचालित हो रही हैं।
इंटरनेट पर बढ़ती बॉट्स की गतिविधियां
इंटरनेट पर इंसानों के मुकाबले बॉट्स की गतिविधियां बढ़ने को लेकर अलग-अलग रिपोर्ट सामने आई हैं। क्लाउडफ्लेयर के मुताबिक जून में बॉट्स ने वेबपेज से जुड़ी कुल रिक्वेस्ट में 57.5 फीसदी हिस्सेदारी दर्ज की। वहीं डाटा सुरक्षा से जुड़ी फ्रांसीसी कंपनी थेल्स की रिपोर्ट के मुताबिक बॉट ट्रैफिक 2023 में लगभग 50 फीसदी था। वहीं उसकी 2026 की रिपोर्ट में यह हिस्सेदारी 53 फीसदी बताई गई है। हालांकि, इन आंकड़ों में अंतर होने की वजह भी है। इंटरनेट पर बॉट्स की गतिवधियों को मापने का कोई एक समान तरीका नहीं है।
कोई भी कंपनी पूरे इंटरनेट के ट्रैफिक पर नजर नहीं रखती। इसलिए अलग-अलग कंपनियों के आकड़े उनके डाटा और मापने के तरीकों के आधार पर बदल सकते हैं। इससे साफ है कि बॉट्स की बढ़ती गतिविधियां चिंता का विषय हैं। हालांकि, इन आंकड़ों को पूरे इंटरनेट की वास्तविक स्थिति का सटीक पैमाना नहीं माना जा सकता। साथ ही बॉट ट्रैफिक का मतलब यह भी नहीं है कि इंटरनेट पर होने वाली आधी से ज्यादा गतिविधियां फर्जी हैं क्योंकि कई बॉट्स वेबसाइटों के लिए जरूरी काम भी करते हैं।