राफेल लड़ाकू विमान के सौदे पर राजनीति गर्माई हुई है। जहां विपक्ष इसे सरकार का घोटाला और अपने दोस्त अनिल अंबानी की मदद करार दे रहा है। वहीं यह मुद्दा इसलिए भी छाया हुआ है क्योंकि फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांक्वा ओलांद ने कहा था कि रिलायंस का नाम भारत सरकार की तरफ से प्रस्तावित किया गया था और हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। इसी बीच फ्रांस की सरकार और राफेल निर्माता कंपनी दसॉल्ट एविएशन ने ओलांद के इस बयान का खंडन किया है। उन्होंने कहा है कि भारत ने किसी तरह का दबाव नहीं बनाया था।
केंद्र सरकार ने भी रिलायंस डिफेंस को राफेल सौदा दिलाने में किसी भी तरह की मदद करने के आरोप को सिरे से खारिज किया है। अपने बयान पर हुए बवाल के बाद ओलांद का कहना है कि इस सौदे के बारे में मुझसे नहीं बल्कि दसॉल्ट से पूछो। दरअसल पूर्व राष्ट्रपति से जब पूछा गया कि क्या रिलायंस और दसॉल्ट के साथ काम करने को लेकर भारत की तरफ किसी तरह का दबाव था तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।
न्यूज एजेंसी एएफपी की मानें तो केवल राफेल निर्माता कंपनी ही इस बारे में किसी तरह की टिप्पणी कर सकती है। इससे पहले ओलांद ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि रिलायंस को चुनने में फ्रांस सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। उन्होंने कहा था कि अनिल अंबानी का नाम भारत ने प्रस्तावित किया था और एविएशन कंपनी के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।
इस मामले पर कंपनी के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने 17 अप्रैल, 2018 को दिए इंटरव्यू में कहा था, 'मेक इन इंडिया नीति के अंतर्गत
दसॉल्ट एविएशन ने भारत के रिलायंस ग्रुप के साथ साझेदारी करने का फैसला लिया। यह दसॉल्ट का चुनाव था।' फ्रांस सरकार के एक बयान के अनुसार, 'फ्रांस और भारत सरकार के बीच अनुबंध पर 23 सितंबर, 2016 को हस्ताक्षर हुए थे। जिसमें भारत को 36 राफेल देने की बात थी।'
भारत के रक्षा मंत्रालय ने ओलांद के बयान के बाद खड़े हुए विवाद को अनावश्यक करार देते हुए खारिज किया है। मंत्रालय का कहना है कि फ्रांस के बयान को पूरी तरह से समझने की जरुरत है। अपने बयान में मंत्रालय ने कहा कि सरकार ने पहले भी यह बात कही है और फिर से अपनी बात को दोहरा रही है कि रिलायंस डिफेंस को ऑफसेट पार्टनर चुनने में सरकार कोई हाथ नहीं है। पहली बार 2005 में ऑफसेट पॉलिसी की घोषणा हुई थी।