देश में साइबर ठगी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। केंद्र सरकार ने बुधवार को राज्यसभा में बताया कि वर्ष 2020 से 2024 के बीच साइबर धोखाधड़ी के मामलों की संख्या लगभग तीन गुना हो गई है। गृह राज्य मंत्री बंदी संजय कुमार ने लिखित जवाब में बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में 10,395 साइबर ठगी के मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 29,758 हो गई। सरकार के अनुसार, 2024 में सबसे अधिक मामले तेलंगाना में दर्ज किए गए।
सरकार ने बताया कि वर्ष 2024 में ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी सबसे बड़ी श्रेणी रही, जिसमें 4,659 मामले दर्ज हुए। इसके बाद क्रेडिट और डेबिट कार्ड धोखाधड़ी के 3,829 मामले सामने आए। मार्केटिंग या निवेश के नाम पर ठगी के 3,044 मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा एटीएम धोखाधड़ी के 1,659, फर्जी कॉल या विशिंग के 1,264, गेमिंग ऐप या वेबसाइट से जुड़े 1,019, ओटीपी धोखाधड़ी के 965 और ई-वॉलेट या यूपीआई धोखाधड़ी के 723 मामले दर्ज किए गए। सरकार ने बताया कि गेमिंग ऐप, निवेश ठगी, विशिंग और ई-वॉलेट या यूपीआई धोखाधड़ी का अलग डेटा केवल वर्ष 2024 से ही रखा जा रहा है।
राज्यवार आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में सबसे अधिक 18,922 साइबर ठगी के मामले तेलंगाना में दर्ज किए गए। इसके बाद बिहार में 4,020 मामले सामने आए। महाराष्ट्र में 2,827 और ओडिशा में 1,546 मामले दर्ज किए गए। सरकार ने कहा कि साइबर अपराध की शिकायतों को एफआईआर में बदलने और आगे की कार्रवाई की जिम्मेदारी संबंधित राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों की होती है।
गृह राज्य मंत्री ने बताया कि साइबर अपराध से निपटने के लिए गृह मंत्रालय ने इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (आई4सी) की स्थापना की है। इसके साथ ही राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल बनाया गया है, जहां नागरिक हर तरह के साइबर अपराध की शिकायत दर्ज कर सकते हैं। वर्ष 2021 में शुरू की गई सिटिजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम (सीएफसीएफआरएमएस) के जरिए वित्तीय धोखाधड़ी की तुरंत सूचना देकर पैसे की निकासी रोकने की कोशिश की जाती है।
सरकार ने बताया कि 30 जून 2026 तक सीएफसीएफआरएमएस की मदद से 32.80 लाख से अधिक शिकायतों में 11,158 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि बचाने में सफलता मिली है। इसके अलावा साइबर अपराध से निपटने के लिए समन्वय प्लेटफॉर्म, साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर, सहयोग पोर्टल, जॉइंट साइबर कोऑर्डिनेशन टीम, साइबर अपराधी संदिग्ध रजिस्ट्री, साइबर कमांडो कार्यक्रम, राष्ट्रीय डिजिटल जांच सहायता केंद्र, शिकायतों के निपटारे के लिए मानक संचालन प्रक्रिया और देशभर में जनजागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं।
पूर्वोत्तर भारत में मादक पदार्थों की तस्करी का तरीका तेजी से बदल रहा है। केंद्र सरकार ने बुधवार को राज्यसभा में बताया कि अब तस्करी करने वाले गिरोह हेरोइन के साथ-साथ म्यांमार से मेथामफेटामाइन (क्रिस्टल मेथ/याबा) जैसे सिंथेटिक ड्रग्स की तस्करी पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लिखित जवाब में कहा कि मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड के रास्ते इन ड्रग्स की तस्करी बढ़ी है। तस्कर सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन ऐप का इस्तेमाल कर सीमा पार तस्करी का समन्वय कर रहे हैं। इसके अलावा देश के विभिन्न हिस्सों से प्रीकर्सर केमिकल्स भी म्यांमार भेजे जाने की सूचनाएं मिली हैं, जिनका इस्तेमाल सिंथेटिक ड्रग्स बनाने में होता है।
सरकार ने बताया कि तस्कर भारत-म्यांमार सीमा के खुले और बिना बाड़ वाले हिस्सों, जंगलों, पैदल रास्तों और पहाड़ी इलाकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। नशीले पदार्थों को वैध माल, यात्री वाहनों और मालवाहक वाहनों में छिपाकर ले जाया जाता है। मोरेह-तामू सीमा अब भी हेरोइन और मेथामफेटामाइन की तस्करी का प्रमुख मार्ग बनी हुई है। वर्ष 2021 से 2025 के बीच कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने 4,626 किलोग्राम एम्फेटामाइन टाइप स्टिमुलेंट (एटीएस) और 2,652 किलोग्राम हेरोइन जब्त की है। सरकार ने बताया कि इस चुनौती से निपटने के लिए 'विजन डॉक्यूमेंट ऑन नारकोटिक्स कंट्रोल 2026-2029', एनसीओआरडी तंत्र को मजबूत करने, पूर्वोत्तर में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के नए कार्यालय खोलने, उन्नत निगरानी प्रणाली, एंटी-ड्रोन तकनीक और संवेदनशील सीमा क्षेत्रों में बेहतर बाड़बंदी जैसे कदम उठाए गए हैं।