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SC Updates: CST कैटरिंग स्टॉल मामले में रेलवे को कदम उठाने के निर्देश; हत्या मामले में 12 साल बाद व्यक्ति बरी

Wed, 29 Jan 2025 07:23 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

SC Updates: सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर कैटरिंग स्टॉल के प्रबंधन में लापरवाही को लेकर रेलवे से सुधारात्मक कदम उठाने को कहा। कोर्ट ने कहा कि सीवीसी रिपोर्ट को लागू करने और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की आवश्यकता है।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) पर कैटरिंग स्टॉल के प्रबंधन में हुई 'लापरवाही' को लेकर रेलवे को तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने आईआरसीटीसी की ओर प्रशासनिक लापरवाही का इशारा करते हुए कहा कि केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) द्वारा दाखिल रिपोर्ट में उसके विभाग के अधिकारियों की गंभीर लापरवाही का जिक्र है। 

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बेंच ने कहा कि रेलवे प्रशासन को सीवीसी की रिपोर्ट की जांच करनी चाहिए और सुधारात्मक कदम उटाने के लिए एक महीने से तीन महीने के भीतर इसे संबंधित अधिकारियों के पास भेजना चाहिए।  कोर्ट ने 21 जनवरी को कहा कि रेलवे को सीवीसी की रिपोर्ट को लागू करना चाहिए। सीवीसी ने लापरवाही के लिए अधिकारियों के खिलाफ कोई आपराधिक कार्रवाई न करने का किया। लेकिन कोर्ट ने रेलवे को तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने और आईआरसीटीसी की सेवाओं के बेहतर बनाने की सलाह दी। 

सीबीआई ने बॉम्बे हाईकोर्ट के पैसले के खिलाफ यह मामला दायर किया था। हाईकोर्ट ने 3 जनवरी 2017 को आरटीआई कार्यकर्ता अजय बी. बोस की शिकायत पर 2013 में विशेष जज द्वारा दिए गए आदेश को खारिज कर दिया था। बोस ने आरोप लगाया था कि रेलवे के सात अधिकारियों ने धोखाधड़ी की और करोड़ों रुपये की चोरी की, जिससे सरकार को भारी नुकसान हुआ। उनका कहना था कि इन अधिकारियों ने बिक्री मूल्य को कम करके रेलवे को कम पैसे जमा कराए और अधिक पैसे लिए व बिना वैध लाइसेंस के स्टॉल चलाए, जो रेलवे कैटरिंग नीति का उल्लंघन था। 
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विशेष जज ने सीबीआई को इस मामले की जांच करने का आदेश दिया था. बोस के वकील आकाश वशिष्ठ ने दलील दी कि सीवीसी की रिपोर्ट में रेलवे के अधिकारियों के कामकाज में व्यापक अनियमितताओं का जिक्र है, जो सीधे तौर पर इस मामले को देख रहे थे। रिपोर् वास्तव में शिकायत में कही गई बातों की पुष्टि करती है।  

हत्या मामले में 12 साल से जेल में बंद व्यक्ति बरी
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केरल में हत्या के एक मामले में 12 साल से अधिक समय से जेल में बंद एक व्यक्ति को बरी कर दिया। जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने दो गवाहों के बयान पर शक जताया और अभियुक्त के दोषी होने की बात साबित नहीं की जा सकी। शीर्ष कोर्ट का यह फैसला आरोपी विनोभाई की याचिका पर आया, जिन्होंने केरल हाईकोर्ट के सितंबर 2016 के फैसले को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने सजा और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था। 

शीर्ष कोर्ट ने कहा, आरोपी को 12 साल से अधिक समय से कारावास में रखा गया है, इसलिए उसे तुरंत रिहा किया जाए,  बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो। विनोभाई पर आरोप था कि उन्होंने 31 दिसंबर 2010 को रामकृष्णन की हत्या की, जिनसे उनकी कथित तौर पर पुरानी दुश्मनी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाया और कहा कि उनके बयान विश्वसनीय नहीं हैं।  

डीके शिवकुमार के मामले में हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ भाजपा विधायक की अपील पर सुप्रीम सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले की जांच के लिए सीबीआई को दी गई सहमति वापस लेने के मामले में भाजपा विधायक बसंगौड़ा आर पाटिल (यतनाल) से सवाल किए। जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने भाजपा विधायक के वकील के परमेश्वर से कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता राजनीतिक लाभ के लिए सुप्रीम कोर्ट आए हैं। जवाब में परमेश्वर ने कहा, राज्य सरकार ने अभी तक अपना जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया है। यह मुद्दा राजनीतिक नहीं है क्योंकि सीबीआई ने भी अपील दायर की है। यह आय से अधिक संपत्ति का मामला है, जहां राज्य सरकार ने सीबीआई को उस व्यक्ति की जांच करने से रोकने के लिए सामान्य सहमति वापस ले ली, जो अब राज्य का उपमुख्यमंत्री है। ऐसा नहीं हो सकता।

सीबीआई के वकील कनु अग्रवाल ने कहा कि अदालत एजेंसी को मामले में कानून के सवाल पर दलीलें पेश करने की अनुमति दे सकती है। पीठ ने समय की कमी के कारण मामले की सुनवाई स्थगित कर दी। पिछले साल 17 सितंबर को शीर्ष अदालत ने शिवकुमार और राज्य सरकार से उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले की जांच के लिए सीबीआई को दी गई सहमति वापस लेने के खिलाफ याचिका पर जवाब मांगा था। पाटिल ने कर्नाटक हाईकोर्ट के 29 अगस्त, 2024 के आदेश को चुनौती दी है, जिसमें सहमति वापस लेने के खिलाफ उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी।

मृतक दंपति की बेटियों को एक करोड़ का मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट ने आज एक फैसले को पलटते हुए सड़क हादसे में मृतक दंपति की चार बेटियों एक करोड़ रुपये से अधिक का मुआजवा देने का आदेश दिया। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला की बेंच ने बेटियों की अपील पर विचार किया। उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। 

एस. विष्णु गंगा, एस माहेश्वरी, ए. ऐश्वर्या गंगा और एस. सुधा रानी के माता-पिता की सड़ हादसे में जान गई थी। यह दंपति सेलेम से मदुरै जा रहे थे, तभी एक बस ने उनके वाहन को नमक्कल के पास टक्कर मार दी थी, जिससे उनकी मौत हो गई। बाद में पता चला कि बस का बीमा नहीं था। बेटियों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) में एक करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की थी। एमएसीटी ने 25 दिसंबर को सबूतों पर विचार करते हुए पिता के लिए 58,24,000 रुपये और मां के लिए 93,61,000 रुपये का मुआवजा मंजूर किया, साथ ही 7.5 फीसदी वार्षिक ब्याज भी लगाया। 

लेकिन ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने इस फैसले को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां 2017 में इस मुआवजे को घटाकर पिता के लिए 26.68 लाख रुपये और मां के लिए 19.22 लाख रुपये कर दिया गाय। जस्टिस अमानुल्ला ने कहा कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने बिना ठोस कारण के मुआवजा कम किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एमएसीटी ने पूरी तरह से विचार के बाद फैसला किया था और यह स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुसार था। इसके बाद शीर्ष कोर्ट ने हाईकोर्ट के पैसले को रद्द कर दिया और एमएसीटी के मुआवजे के फैसले को बहाल किया। कोर्ट ने छह हफ्ते के भीतर मुआवजा राशि का भुगतान करने का आदेश दिया। 
 
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किसान आंदोलन: सुप्रीम कोर्ट ने डल्लेवाल के चिकित्सा सहायता लेने के बारे में संज्ञान लिया
सुप्रीम कोर्ट ने किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल द्वारा चिकित्सा सहायता लेने और 14 फरवरी को चंडीगढ़ में केंद्र के प्रतिनिधियों के साथ बैठक में शामिल होने की इच्छा व्यक्त करने का बुधवार को न्यायिक संज्ञान लिया। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की बेंच ने कृषि कानूनों को निरस्त किए जाने के बाद 2021 में प्रदर्शनकारी किसानों को फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी समेत प्रस्ताव के कार्यान्वयन के लिए केंद्र को निर्देश देने के अनुरोध संबंधी याचिका पर सुनवाई स्थगित कर दी।

जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता गुणीन्दर कौर गिल से कहा कि डल्लेवाल ने 28 जनवरी को मीडिया को एक साक्षात्कार दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह चिकित्सा सहायता ले रहे हैं और उन्होंने 14 फरवरी को होने वाली बैठक में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की है। उन्होंने कहा, ‘उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति पर भी भरोसा जताया है और उम्मीद है कि निर्धारित बैठक से कुछ समाधान निकलेगा।’ शीर्ष कोर्ट ने कहा कि वह किसी भी भ्रम से बचने के लिए चंडीगढ़ में बैठक होने तक मामले की सुनवाई नहीं करना चाहती। बेंच ने सुनवाई 14 फरवरी के बाद निर्धारित की।

गिल ने कहा कि सरकार ने 2021 में प्रस्ताव को लागू करने पर सहमति जताई थी लेकिन अब वह पीछे हट गई है। बेंच ने याचिकाकर्ता से धैर्य रखने को कहा और यह भी कहा कि आवश्यकता पड़ने पर वह आदेश पारित करेगी। बेंच ने कहा, ‘पहले उन्हें बातचीत करने दीजिए।’
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