वर्तमान में तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन के कारण ही लू, बढ़ता पारा, पिघलते ग्लेशियर, बाढ़, तूफान जैसी कठोर मौसमी घटनाएं बढ़ रही हैं। इस बीच, सीएसई की हालिया रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में इस साल के पहले नौ महीनों में लगभग 90 प्रतिशत दिनों में सामान्य मौसम में गिरावट दर्ज की गईं है। साथ ही रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ऐसी घटनाओं से हिमाचल प्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित रहा। यहां सबसे अधिक मनुष्यों मौत की रिपोर्ट दर्ज की गई है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) द्वारा जारी 'एक्सट्रीम वेदर रिपोर्ट 2022' में कहा गया है कि भारत ने इस साल 1 जनवरी से 30 सितंबर तक 273 दिनों में से 241 दिनों में कठोर मौसम की घटनाएं दर्ज कीं। इन आपदाओं के कारण साल के पहले नौ महीनों में 2,775 लोगों की मौत हो गई। साथ ही 1.8 मिलियन हेक्टेयर फसल बर्बाद हो गई। वहीं, इसमें यह भी बताया गया है कि आपदाओं के कारण 4,16,667 से अधिक घर नष्ट हो गए और करीब 70,000 पशुओं की भी जान चली गई।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट ने यह भी कहा है कि कठोर मौसमी दशाओं के कारण होने वाले नुकसान का यह अनुमान वास्तविकता से कम होगा। क्योंकि क्योंकि प्रत्येक घटना के लिए डेटा एकत्र नहीं किया जाता है, न ही सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान या फसल के नुकसान की गणना की जाती है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक, मौतों के नुकसान के मामले में कठोर मौसमी घटनाओं के कारण मध्य भारत में सबसे अधिक 887 मौतें हुईं, इसके बाद पूर्व और पूर्वोत्तर क्षेत्र में 783 मौतें दर्ज की गईं। रिपोर्ट के मुताबिक, कठोर मौसमी घटनाओं के कारण हिमाचल प्रदेश में सबसे अधिक 359 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई। इसके बाद मध्य प्रदेश और असम में 301 लोगों की मौत दर्ज की गई। इसके अलावा असम में बाढ़ जैसी कठोर मौसमी घटनाओं के कारण सबसे ज्यादा लोगों के घर नष्ट हो गए और यहां सबसे ज्यादा पशुओं की मौत दर्ज की गई है।
वहीं, राजधानी दिल्ली में बिजली गिरने और तूफान के साथ चार दिनों तक कटोर मौसमी घटनाएं सामने आईं। इन घटनाओं के कारण तीन लोगों की मौत हुई। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भी दो दिन भारी बारिश, 28 हीटवेव दिन और सात शीत लहर दिन दर्ज किए गए। 2022 में, भारत ने 1901 के बाद से अपना सातवां सबसे गर्म जनवरी दर्ज किया। यह मार्च अब तक का सबसे गर्म और 121 वर्षों में तीसरा सबसे सूखा महीना था। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में पिछले 121 वर्षों में सबसे गर्म और सबसे शुष्क जुलाई रहा।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने भारतीय मौसम विभाग से जुटाए आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट जारी की है। इसके अनुसार देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में अत्याधिक गर्मी पर सभी का ध्यान गया, पर पूरे देश में लगभग यही चलन नजर आ रहा है। शहरों में खत्म होते तालाब, घटती हरियाली गर्मी और बढ़ा रहे हैं। प्री-मानसून समय में गर्मियों के महीनों मार्च से मई तक को शामिल किया गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि लू से 2000 से 2020 के दौरान 20,615 लोगों की मौत हुई।
मानसून में औसत से ज्यादा गर्मी
देशव्यापी औसत के अनुसार जून से सितंबर का तापमान प्री-मानसून महीनों से 0.3 से 0.4 डिग्री अधिक मिला। 1951 से 1980 के तापमान से बनी बेसलाइन से इस दशक में औसत तापमान 0.49 डिग्री अधिक रहा। पोस्ट-मानसूनी महीनों यानी अक्तूबर से दिसंबर में यह वृद्धि 0.73 और सर्दियों के महीनों जनवरी व फरवरी में 0.68 डिग्री अधिक रही।