राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने इस वर्ष सीआरपीएफ के 19 जवानों द्वारा की गई आत्महत्या के मामले को अत्यंत गंभीर माना है। इस बाबत आयोग ने केंद्रीय गृह सचिव और डीजी से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। दोनों शीर्ष अधिकारियों को दो सप्ताह में यह रिपोर्ट देनी होगी। बल के आधिकारिक डेटा के अनुसार, एनएचआरसी (भारत) ने जनवरी से मई 2026 के बीच 19 सीआरपीएफ जवानों की मौत का स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने पाया है कि यदि मीडिया रिपोर्ट की बातें सच हैं, तो ये देश के सबसे बड़े केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में काम करने वाले जवानों के जीवन के अधिकार के उल्लंघन से जुड़े गंभीर मुद्दे हैं। यही वजह है कि आयोग ने गृह मंत्रालय के गृह सचिव और सीआरपीएफ के महानिदेशक को नोटिस जारी कर दो हफ्ते के भीतर इस मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में कुल 281 सीआरपीएफ जवानों ने आत्महत्या की है। इनमें से लगभग 216 जवान ड्यूटी पर थे। सीआरपीएफ ने 2021 में 57, 2022 में 43, 2023 में 57, 2024 में 46 और 2025 में 59 आत्महत्याओं के मामले दर्ज किए हैं। बता दें कि सीआरपीएफ, देश का सबसे बड़ा केंद्रीय अर्धसैनिक बल हैं। लगभग 3.25 लाख कर्मियों वाले इस बल को अहम मोर्चों पर तैनात किया जाता है। आतंकवाद या नक्सल से प्रभावित क्षेत्रों में सीआरपीएफ की बड़े पैमाने पर तैनाती रही है। उत्तर पूर्व के उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में भी सीआरपीएफ और इसकी विशेष इकाई 'कोबरा' को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है।
बल के पूर्व अफसरों का कहना है कि आयोग की इस पहल ने सीआरपीएफ जवानों की सुरक्षा, मानसिक दबाव, कार्य परिस्थितियों और कल्याण से जुड़े सवालों को फिर से चर्चा में ला दिया है। सीआरपीएफ में आत्महत्या के अलावा सहकर्मी जवान द्वारा साथी जवान पर गोली चलाना, ऐसी घटनाएं भी हो रही हैं। मौजूदा डीजी के कार्यकाल में हुई इन घटनाओं से साबित होता है कि जवानों की बात ठीक से नहीं सुनी जा रही।
हालांकि मौजूदा डीजी, जवानों के साथ लगातार संवाद करते हैं, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उनकी दिक्कतों का समाधान करने की कोशिश करते रहते हैं। नियमित तौर पर वे सैनिक सम्मेलन भी करते हैं, लेकिन इसके बावजूद जवानों के मन की बात नहीं समझ पाना, कहीं न कहीं व्यवस्था की कमियों को उजागर करता है। ऐसे में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या सीआरपीएफ में बढ़ता परिचालन दबाव, लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों में तैनाती, मानसिक तनाव और यूनिट स्तर पर उपलब्ध सहायता-व्यवस्थाएं जवानों के मनोबल एवं मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं।