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सीआरपीएफ पर 'हार्ट अटैक' का खतरा, सभी कर्मियों को 24 घंटे अपनी जेब में रखनी होंगी ये 6 गोलियां...  

Thu, 05 Sep 2019 09:15 PM IST
देव कश्यप जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली 

सार

  • अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ पर मंडरा रहा है हार्ट अटैक का खतरा
  • जुलाई माह में ही हार्ट अटैक से दस कर्मियों की मौत हो गई है। हजारों कर्मी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर इस बीमारी के करीब पहुंच चुके हैं
  • सभी जवान और अधिकारी 24 घंटे अपनी जेब में चार गोली सोर्बिट्रेट (5 एमजी) और दो गोली डिस्प्रिन (300 एमजी)  की रखेंगे
  • दवा किट 20 सितंबर तक सीआरपीएफ की हर यूनिट, सेक्टर और मुख्यालय में उपलब्ध करा दी जाएगी।
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सीआरपीएफ - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ पर हार्ट अटैक का खतरा मंडरा रहा है। हर माह सीआरपीएफ के कई जवान और अफसर इसकी चपेट में आ रहे हैं। इस साल अकेले जुलाई माह में ही हार्ट अटैक से दस कर्मियों की मौत हो गई है। हजारों कर्मी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर इस बीमारी के करीब पहुंच चुके हैं।सीआरपीएफ के आईजी निदेशक (मेडिकल) ने इस बीमारी को गंभीरता से लेते हुए यह आदेश जारी कर दिया है कि सभी जवान और अधिकारी 24 घंटे अपनी जेब में छह गोलियां रखेंगे। इनमें चार गोली सोर्बिट्रेट (5 एमजी) और दो गोली डिस्प्रिन (300 एमजी) शामिल हैं। हार्ट अटैक से बचाने वाली यह दवा किट 20 सितंबर तक सीआरपीएफ की हर यूनिट, सेक्टर और मुख्यालय में उपलब्ध करा दी जाएगी।

हार्ट अटैक से नहीं बच पा रहे हैं सीआरपीएफ कर्मी...  

बता दें कि सीआरपीएफ में हार्ट अटैक के मामले बढ़ते जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह बीमारी पचास साल की आयु वाले जवानों या अफसरों में ही देखने को मिल रही है, बल्कि 25 से 35 साल के कर्मी भी इससे पीड़ित बताए गए हैं। कुछ दिन पहले ही सीआरपीएफ की 172 बटालियन के कमांडेंट मुरारी झा का हृदय गति रुकने से निधन हो गया था। वे छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में तैनात थे। सिकन्दरपुर (बलिया) तहसील क्षेत्र के सिसोटार निवासी सीआरपीएफ इंस्पेक्टर सुरेंद्र राम पुत्र जग्गाराम (50 वर्ष) की भी गत माह हृदयाघात से मृत्यु हो गई थी। वे अरुणाचल प्रदेश में सीआरपीएफ की बटालियन जी-152 में तैनात थे।

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पिछले साल कांस्टेबल हरि ओम कश्मीर में चुनावी ड्यूटी दे रहा था। सुबह के वक्त हृदयाघात से उसकी मौत हो गई। वह हरियाणा में खंडूरा रेवाड़ी का रहने वाला था। 2016 से जुलाई 2018 के बीच करीब 13 सौ सीआरपीएफ कर्मियों की जान बीमारी की वजह से चली गई। इनमें हार्ट अटैक, डिप्रेशन, मलेरिया और आत्महत्या शामिल हैं। 2016 में अकेले हार्ट अटैक से ही 96 कर्मी मारे गए थे। गत वर्ष भी यह आंकड़ा सौ से ज्यादा रहा है।

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6 गोलियों का इस्तेमाल कब और कैसे करना है, ये जानकारी भी दी जा रही है...

सीआरपीएफ के आईजी निदेशक (मेडिकल) ने सभी यूनिटों और सेक्टरों को जो पत्र भेजा है, उसमें छह गोलियों के इस्तेमाल की जानकारी भी दी गई है। अगर किसी जवान को हार्ट अटैक आता है तो उसे पहले डिस्प्रिन की गोली चबानी होगी। इसके बाद सोर्बिट्रेट की एक गोली अपनी जीभ के नीचे रखनी पड़ेगी। सोर्बिट्रेट की गोली को दस मिनट बाद दोबारा भी लिया जा सकता है। छाती के बीच में दर्द है तो क्या करें, ये सब बातें जवानों को विस्तार से बताई जाएंगी। दवा किट देते वक्त उन्हें बताया जाएगा कि लेफ्ट या राइट साइड में दर्द है तो क्या करें। गर्दन के पास या कमर की ओर दर्द है तो उस स्थिति में कौन सी दवा का इस्तेमाल करना है, यूनिटों में तैनात डॉक्टर ये सब जानकारी जवानों को देंगे। जवानों से कहा गया है कि वे इस तरह के दर्द को हल्के में न लें। अगर किसी को हार्ट अटैक का थोड़ा बहुत दर्द या अन्य कोई लक्ष्ण दिखाई दे तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

हार्ट अटैक के चलते बदला गया था सीआरपीएफ का मेनू...

गत वर्ष सीआरपीएफ जवानों को मनपसंद खाना नहीं मिलने की खबरें सामने आई थी। जवानों की शिकायत थी कि उनके खाने का मेनू बदल दिया गया है। सुबह नाश्ते में पहले छोले भटूरे, कभी हलवा व डोसा उत्पम मिलता था, अब वह सब बंद हो गया है। डिनर में मटर-पनीर भी अब कभी कभार ही दिखाई पड़ता है। जिन कर्मियों की आयु 45 साल या उससे ज्यादा है, उनके लिए तो अब सातों दिन एक जैसा ही डिनर बन रहा है। केवल सब्जी बदल जाती है। जवानों का तर्क था कि दूर-दराज के इलाके, जंगल या पहाड़ पर तैनात कर्मियों के लिए लजीज भोजन केवल पेट भरने का साधन ही नहीं, बल्कि वह मनोरंजन की तरह होता है। वे पैसा भी देते हैं, लेकिन खाना उनके मिजाज का नहीं मिलता। पहले नाश्ते में नमकीन-मीठा सब होता था, अब वह भी नहीं मिलता है। सीआरपीएफ मुख्यालय के अफसरों का कहना था कि जवानों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर नया मेनू तैयार किया गया है। इसमें बाकायदा चिकित्सकों की भी सलाह ली गई है।

हमारे जवान गलत खानपान के चलते हार्टअटैक जैसी बीमारियों का शिकार हो रहे थे। देखने में आया था कि पहले जवान तला हुआ भोजन ज्यादा करते थे। कई बार जवान तय मात्रा से कहीं अधिक नॉनवेज खा लेते थे। भागदौड़ करने के लिए उनके पास न समय और न ही जगह होती थी। हैवी डाइट लेने के बाद जवान या तो ड्यूटी पर खड़ा रहता या फिर सो जाता था। अगर वह भागदौड़ करना भी चाहे तो भी नहीं कर सकता था। वजह, वह इलाका ही ऐसा होता है कि जरा भी अपनी टीम से इधर उधर हुए, कहीं से कोई गोली आ जाती थी। उत्तरपूर्व, नक्सल इलाके या कश्मीर, ऐसी जगहों पर जवानों के लिए दौड़भाग करना बहुत जोखिम भरा रहता है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर नया मेनू तैयार किया गया है। अब जवानों को, खासतौर पर 45 साल से ऊपर की आयु वालों को नाश्ते में भिगोया हुआ चना आदि मिलता है। कभी उत्पम और डोसा भी परोस देते हैं। डिनर की बात करें तो चावल, दाल-रोटी और थोड़ी बहुत सलाद मिलती है। इसके अतिरिक्त थोड़े समय के अंतराल पर सूजी की खीर भी दे देते हैं।

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