6 गोलियों का इस्तेमाल कब और कैसे करना है, ये जानकारी भी दी जा रही है...
सीआरपीएफ के आईजी निदेशक (मेडिकल) ने सभी यूनिटों और सेक्टरों को जो पत्र भेजा है, उसमें छह गोलियों के इस्तेमाल की जानकारी भी दी गई है। अगर किसी जवान को हार्ट अटैक आता है तो उसे पहले डिस्प्रिन की गोली चबानी होगी। इसके बाद सोर्बिट्रेट की एक गोली अपनी जीभ के नीचे रखनी पड़ेगी। सोर्बिट्रेट की गोली को दस मिनट बाद दोबारा भी लिया जा सकता है। छाती के बीच में दर्द है तो क्या करें, ये सब बातें जवानों को विस्तार से बताई जाएंगी। दवा किट देते वक्त उन्हें बताया जाएगा कि लेफ्ट या राइट साइड में दर्द है तो क्या करें। गर्दन के पास या कमर की ओर दर्द है तो उस स्थिति में कौन सी दवा का इस्तेमाल करना है, यूनिटों में तैनात डॉक्टर ये सब जानकारी जवानों को देंगे। जवानों से कहा गया है कि वे इस तरह के दर्द को हल्के में न लें। अगर किसी को हार्ट अटैक का थोड़ा बहुत दर्द या अन्य कोई लक्ष्ण दिखाई दे तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
हार्ट अटैक के चलते बदला गया था सीआरपीएफ का मेनू...
गत वर्ष सीआरपीएफ जवानों को मनपसंद खाना नहीं मिलने की खबरें सामने आई थी। जवानों की शिकायत थी कि उनके खाने का मेनू बदल दिया गया है। सुबह नाश्ते में पहले छोले भटूरे, कभी हलवा व डोसा उत्पम मिलता था, अब वह सब बंद हो गया है। डिनर में मटर-पनीर भी अब कभी कभार ही दिखाई पड़ता है। जिन कर्मियों की आयु 45 साल या उससे ज्यादा है, उनके लिए तो अब सातों दिन एक जैसा ही डिनर बन रहा है। केवल सब्जी बदल जाती है। जवानों का तर्क था कि दूर-दराज के इलाके, जंगल या पहाड़ पर तैनात कर्मियों के लिए लजीज भोजन केवल पेट भरने का साधन ही नहीं, बल्कि वह मनोरंजन की तरह होता है। वे पैसा भी देते हैं, लेकिन खाना उनके मिजाज का नहीं मिलता। पहले नाश्ते में नमकीन-मीठा सब होता था, अब वह भी नहीं मिलता है। सीआरपीएफ मुख्यालय के अफसरों का कहना था कि जवानों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर नया मेनू तैयार किया गया है। इसमें बाकायदा चिकित्सकों की भी सलाह ली गई है।
हमारे जवान गलत खानपान के चलते हार्टअटैक जैसी बीमारियों का शिकार हो रहे थे। देखने में आया था कि पहले जवान तला हुआ भोजन ज्यादा करते थे। कई बार जवान तय मात्रा से कहीं अधिक नॉनवेज खा लेते थे। भागदौड़ करने के लिए उनके पास न समय और न ही जगह होती थी। हैवी डाइट लेने के बाद जवान या तो ड्यूटी पर खड़ा रहता या फिर सो जाता था। अगर वह भागदौड़ करना भी चाहे तो भी नहीं कर सकता था। वजह, वह इलाका ही ऐसा होता है कि जरा भी अपनी टीम से इधर उधर हुए, कहीं से कोई गोली आ जाती थी। उत्तरपूर्व, नक्सल इलाके या कश्मीर, ऐसी जगहों पर जवानों के लिए दौड़भाग करना बहुत जोखिम भरा रहता है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर नया मेनू तैयार किया गया है। अब जवानों को, खासतौर पर 45 साल से ऊपर की आयु वालों को नाश्ते में भिगोया हुआ चना आदि मिलता है। कभी उत्पम और डोसा भी परोस देते हैं। डिनर की बात करें तो चावल, दाल-रोटी और थोड़ी बहुत सलाद मिलती है। इसके अतिरिक्त थोड़े समय के अंतराल पर सूजी की खीर भी दे देते हैं।