देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' के एक कमांडेंट ने विभाग के ही डीआईजी विजिलेंस की शिकायत राष्ट्रपति से की है। राष्ट्रपति को भेजी शिकायत में कमांडेंट ने आरोप लगाया है कि उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। उसके खिलाफ अनधिकृत अनुशासनात्मक कार्यवाही और जबरन अटैचमेंट (तैनाती) के अधिकार का दुरुपयोग किया जा रहा है। कमांडेंट, पंकज पीटर शाह, उत्तर प्रदेश के चंदौली स्थित ग्रुप सेंटर पर तैनात हैं। डीआईजी विजिलेंस ने उन्हें डिब्रूगढ़, असम में करीब तीन हजार किलोमीटर दूर जांच अधिकारी (आईओ) के कार्यालय से अटैच कर दिया है। बल मुख्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस मामले की पुष्टि की है।
सूत्रों के अनुसार, संजय कुमार सिंह, डीआईजी विजिलेंस ने डिब्रूगढ़ में डीआईजी प्रभाकर त्रिपाठी से कहा है कि सीओ पीटर शाह को उनके दफ्तर में भेजा जा रहा है। वे हर समय दफ्तर में ही मौजूद रहेंगे। प्रभाकर त्रिपाठी यह सुनिश्चित करेंगे कि कमांडेंट पीटर की हर गतिविधि डीआईजी की मर्जी से हो। कमांडेंट पीटर ने राष्ट्रपति को भेजी शिकायत में कहा है कि डीआईजी सीआर/विजिलेंस द्वारा 10 मार्च 2025 को आरोपों का एक ज्ञापन जारी किया गया था। इसे 123 अभियोजन साक्ष्यों और 19 अभियोजन गवाहों पर आधारित बताया गया।
हालांकि, शिकायतकर्ता का आरोप है कि सूचीबद्ध 100 से अधिक साक्ष्य और 10 गवाहों के बयान मौजूद ही नहीं हैं। इससे यह जांच आधारहीन और दुर्भावनापूर्ण हो जाती है। सूत्रों का कहना है कि यह मामला एसआरई फंड से जुड़ा है। स्टेट ने ऑडिट में क्लीन चिट दे दी। पेमेंट भी हो चुकी है। उसके बाद एकाएक पीटर से पूछताछ की जाने लगी। जब सामान बना तो ठीक था। बाद में उसमें कई तरह की कमियां निकाली गई। उस प्रक्रिया में कमांडेंट के अलावा पांच छह लोग शामिल थे, लेकिन टारगेट केवल कमांडेंट को किया गया। कमांडेंट की विभागीय जांच शुरू कर दी गई।
शिकायत के मुताबिक, यह जांच अनुशासनात्मक प्राधिकरण (आप स्वयं) की मंजूरी के बिना, मेरे करियर को बर्बाद करने के लिए एक निहित स्वार्थी समूह द्वारा अनधिकृत रूप से शुरू की गई थी। मुझे झुकने पर मजबूर करने और इस अनधिकृत जांच को पूरा करने के लिए, डीआईजी विजिलेंस ने मेरे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हुए मुझे डिब्रूगढ़, असम में जांच अधिकारी (आईओ) के कार्यालय से अटैच कर दिया है। यह मेरी ड्यूटी की जगह से 3000 किमी दूर है। साथ ही, उन्होंने मेरी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रतिबंधित कर दिया है, जो एक तरह से 'ओपन अरेस्ट' (खुली गिरफ्तारी) के समान है।
सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 या सीआरपीएफ नियमों के तहत ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो जांच पूरी करने के उद्देश्य से इस तरह के अटैचमेंट की अनुमति देता हो। ड्यूटी पर मौजूद अधिकारी से बिना पूछे इस तरह का आदेश जारी करना, नियमों का उल्लंघन करना है। डीआईजी विजिलेंस ने अपने आदेश में कहा है कि 'आरोपी अधिकारी' (सीओ) को (आईओ) ऑफ़िस में शारीरिक रूप से मौजूद रहना चाहिए। उनकी हर गतिविधि आईओ की सहमति के अनुसार होनी चाहिए।
कमांडेंट पीटर ने डीआईजी के खिलाफ शिकायत में लिखा है कि उन्होंने भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (मानवीय गरिमा के साथ जीने का मौलिक अधिकार) के तहत मिली मेरी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन किया है। डीआईजी विजिलेंस ने अपने अधिकार का दुरुपयोग करते हुए एक अनधिकृत अटैचमेंट का आदेश दिया, जो किसी भी नियम के तहत मान्य नहीं है, और इस तरह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया है। उन्होंने मुझे मानसिक दबाव और उत्पीड़न का शिकार बनाया है, जिससे मेरे मानवाधिकारों और संविधान के अनुच्छेद 14 (मौलिक अधिकार) के तहत कानून के समक्ष समानता की गारंटी का उल्लंघन हुआ है।
कमांडेंट ने अपनी शिकायत में लिखा है कि मैं यह बात रिकॉर्ड पर लाना चाहता हूँ कि मौजूदा हालात में मुझे बहुत ज़्यादा मानसिक और शारीरिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मैं तनाव में हूं क्योंकि हाल ही में मेरी दिल की एक बड़ी सर्जरी हुई है। मैं किसी भी जाँच में अपना बचाव करने की स्थिति में नहीं हूँ। कमांडेंट ने राष्ट्रपति से गुजारिश की कि मेरे मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आप दखल दें। सीआरपीएफ पहले से ही आत्महत्या और साथियों की हत्या के बढ़ते मामलों से जूझ रही है। अगर मेरे जैसे सीनियर अफ़सर के साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है, तो यह संस्था के कल्चर पर बुरा असर डालता है। ऐसी दुखद घटनाओं की एक वजह भी बन सकता है। कमांडेंट ने शिकायत की प्रति केंद्रीय गृह सचिव, एनएचआरसी के चेयरमैन, डीजी सीआरपीएफ और स्पेशल डीजी नॉर्थ ईस्टर्न जोन सीआरपीएफ गोवाहाटी को भेजी है।