इन अति विशिष्ट लोगों की सुरक्षा में लगे सीआरपीएफ कमांडो बहादुरी के कई कारनामों में दुनिया भर में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। विश्व की सबसे विशिष्ट फोर्स ‘कोबरा’ यानी (कमांडो बटालियन फॉर रिसोल्यूट एक्शन) विंग से भी अनेक कमांडो जेड प्लस सुरक्षा में आते रहते हैं।
बता दें कि एसपीजी सुरक्षा मौजूदा प्रधानमंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री एवं उनके परिजनों को दी जाती है। पिछले साल तक यह सुरक्षा पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को मिलती रही है। वाजपेयी को उनके निधन तक एसपीजी सुरक्षा क्वच प्रदान किया गया था। पूर्व पीएम एचडी देवेगौड़ा की एसपीजी पहले ही हटा ली गई थी। इस साल पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह की एसपीजी सुरक्षा भी वापस ले ली गई। मौजूदा समय में पीएम नरेंद्र मोदी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के पास एसपीजी सुरक्षा है।
गृह मंत्रालय में वीवीआईपी लोगों की सुरक्षा का रिव्यू करने वाली कमेटी, जिसमें आईबी की सिफारिश को प्रमुखता दी जाती है, ने फैसला किया है कि अब गांधी परिवार को एसपीजी सुरक्षा की जरुरत नहीं है। उन्हें सीआरपीएफ की जेड प्लस सुरक्षा मुहैया कराई जाए। सीआरपीएफ कमांडो जो अब गांधी परिवार की सुरक्षा करेंगे, वे बल की कई यूनिटों से आते हैं। इनमें कोबरा इकाई के कमांडो भी शामिल हैं। कोबरा यूनिट का गठन 'यूएस मरीन कमांडो फोर्स' की तर्ज पर हुआ था।
2015 में गणतंत्र दिवस की परेड में पहली बार सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो राष्ट्र के सामने आए थे। कोबरा यूनिट का गठन करने से पहले यूएस मेरिन कमांडो, उनकी ट्रेनिंग, वर्किंग स्टाइल, सर्जीकल स्ट्राइक और दूसरे कई तरह के ऑपरेशन की जानकारी ली गई। इन सबके बाद ही कोबरा यूनिट स्थापित हुई थी। यह विशिष्ट कमांडो फोर्स जंगल में बिना किसी मदद के 11 दिन तक लड़ सकती है। इसी वजह से कोबरा विश्व में पहले स्थान पर है।
नक्सलियों, आतंकियों से लड़ने, वीवीआईपी सुरक्षा और दूसरे बड़े ऑपरेशनों के लिए इस विशिष्ट फोर्स को खास तरह की ट्रेनिंग दी गई है। हथियार, वर्दी एवं तकनीकी उपकरणों के मामले में भी 'कोबरा' दूसरे सभी बलों से पूरी तरह अलग हैं। बिना किसी मदद के लगातार डेढ़ सप्ताह तक जंगलों में लड़ते रहना इस फोर्स की खासियत है।
अलकायदा सरगना लादेन को मार गिराने वाले अमेरीकी मरीन कमांडो बिना किसी मदद के जंगल में लगातार तीन रातों तक लड़ सकते हैं। तो दूसरी ओर सीआरपीएफ के हर कोबरा कमांडो के लिए ट्रेनिंग के दौरान सात दिन तक जंगल में लड़ने की परीक्षा पास करना अनिवार्य है। कई साल पहले कोबरा ने सारंडा (झारखंड) के घने जंगलों में 11 दिन तक बिना किसी सहायता के एक बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया था।
वजन लेकर जंगल में नियमित रूप से लड़ते रहने का रिकॉर्ड ब्रिटेन के विशिष्ट कमांडो दस्ते 'एसएएस' के नाम पर है। यह दस्ता 30 किलो वजन उठाकर दस रातें जंगल में गुजार सकता है, जबकि कोबरा 23 किलो वजन के साथ 11 रातों तक गहन जंगल से गुजरने में समर्थ हैं।
यूएस मरीन कमांडो की तर्ज पर सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो को भी मरपट (मेरिन पैटर्न) वर्दी मिलती है। यानी इसमें सभी तरह के तकनीकी उपकरण लगे होते हैं। वीवीआईपी सुरक्षा और विभिन्न ऑपरेशन करने में निपुण कोबरा कमांडो को यूएस आर्मी जैसा पैसजट (पर्सनल आर्मर सिस्टम-ग्राउंड टू्रप्स) हेलमेट, यूएस के एम-1 हेलमेट और जर्मन आर्मी के ‘स्टेहेलम’ हेलमेट मुहैया कराए जाते हैं। ये कमांडो इजराइल निर्मित एमटीएआर व एक्स-95 राइफल जैसे अत्याधुनिक हथियारों से लैस रहते हैं। कमांडो के पास जीपीएस के अलावा रात को दिखने में मदद करने वाला चश्मा होता है। अब इन्हें जैमर और बुलेट प्रूफ तकनीक मुहैया करा दी गई है।
वीवीआईपी सुरक्षा में तैनात होने वाले जवानों को नोएडा में ट्रेनिंग दी जाती है। दो माह की प्री-इंडक्शन ट्रेनिंग में जवानों को वीवीआईपी सुरक्षा, भवनों या किसी विशेष स्पॉट की हिफाजत से संबंधित हर बारीकि से अवगत कराया जाता है। इस दौरान जवानों को कई तरह की परीक्षा पास करनी होती है। उसके बाद ही उन्हें वीवीआईपी सुरक्षा यूनिट का हिस्सा बनाया जाता है। हमारे जवानों की खासियत है कि ये किसी भी परिस्थिति में काम कर सकते हैं।
चूंकि पूरे देश में सीआरपीएफ के सेंटर हैं, इसलिए जवानों को हर राज्य की जानकारी मिलती रहती है। वे सुरक्षा की बारीकियों को अच्छे से समझने लगते हैं। सीआरपीएफ की कोबरा या दूसरी यूनिटों के बहादुर जवान एसपीजी और एनएसजी में जाते रहते हैं। वहां से वापस लौटने वाले कई जवानों को वीवीआईपी सुरक्षा यूनिट में भेज दिया जाता है। इन जवानों के बारे में बताया जाता है कि ये एसपीजी से किसी भी मामले में कम नहीं हैं। फर्क केवल इतना है कि ये कमांडो वर्दी में रहेंगे, जबकि एसपीजी कर्मी सादे कपड़ों में तैनात रहते हैं।