देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुंह खोलना किसी अधिकारी को कितना महंगा पड़ सकता है, इसका एक ताजा उदाहरण देखने को मिला है। 'सेकंड इन कमांड', विकास चौधरी ने अपने कमांडेंट और डीआईजी के कथित भ्रष्टाचार को उजागर किया था। नतीजा, विकास की वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (एपीएआर) में प्रतिकूल टिप्पणियां कर दी गई। इससे विकास की पदोन्नति में बाधा आ गई।
उन्होंने अपने शीर्ष अफसरों के समक्ष यह मामला रखा, लेकिन वहां से भी उसे कोई न्याय नहीं मिला। जब सभी रास्ते बंद हो गए तो विकास ने जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबी सुनवाई के बाद विकास चौधरी को न्याय मिला। उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की प्रतिकूल 'एपीएआर' को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस केस में वरिष्ठ अफसरों बहुत ज्यादा पूर्वाग्रह और प्रतिशोध की भावना से काम किया है। वजह, विकास चौधरी ने दोनों अफसरों के भ्रष्टाचार की पोल खोली थी और उस बाबत चुप रहने से मना कर दिया था।
न्यायमूर्ति मोहम्मद अकरम चौधरी ने रिट पिटिशन डब्लूपी (सी) संख्या 1607/2023 में फैसला सुनाते हुए कहा, विकास चौधरी, सेकंड-इन-कमांड (आईआरएलए 5278), रेंज मुख्यालय, सीआरपीएफ हीरानगर, जम्मू और कश्मीर, की 2018-2019 की एपीएआर को अपग्रेड किया जाए। इसके लिए की स्पेशल 'विभागीय पदोन्नति समिति' (डीपीसी) की बैठक हो। याचिकाकर्ता के जूनियर साथी, जो अब आगे निकल गए हैं, उनके साथ वरिष्ठता फिक्स की जाए। यानी बैक डेट से पदोन्नति एवं वित्तीय लाभ दिए जाएं। हाईकोर्ट ने कहा, लिहाजा कमांडेंट के खिलाफ के पहले से ही जांच चल रही है तो ऐसे में उनके खिलाफ अलग से जांच आदेश नहीं दिया जा रहा।
सीआरपीएफ के टूआईसी विकास चौधरी की 2018-2019 और 1-4-20 से 5-8-20 तक, उक्त दोनों अवधि की एपीएआर में 'गुड' लिखकर भेजा गया। पदोन्नति के लिए एपीएआर का 'वेरी गुड' होना आवश्यक है। अगर एपीएआर का स्तर इससे कम है तो उसे खराब माना जाता है।
विकास चौधरी का आरोप था कि कमांडेंट और डीआईजी, दोनों भ्रष्टाचार में लिप्त थे। जब मैने उन दोनों का भ्रष्टाचार में साथ नहीं दिया तो उन्होंने एपीएआर खराब कर दी। इस बाबत विकास ने 10 नवंबर 2019 को एडीजी को लिखा। अपने प्रतिवेदन में उन्होंने सारी बात बताई। 15 फरवरी 2021 को विभाग ने उसके प्रतिवेदन को रिजेक्ट कर दिया। 13 जून 2016 से 31 मार्च 2017 तक जो एडवर्स रिमार्क था, उसे ठीक कर दिया गया।
2018 में छत्तीसगढ़ में 62 वीं बटालियन में मनीष कुमार मीणा, कमांडेंट और डीआईजी एसके मिश्रा थे। विकास चौधरी ने इन दोनों पर ही भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। इसके बाद 2019-20 में भी शत्रुता का भाव नजर आया। पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत दुश्मनी, ऐसे भाव से विकास की एपीएआर में गुड से भी नीचे का रिमार्क दे दिया गया। आईजी ने उस रिमार्क 'वेरी गुड' कर दिया। 2020 से 2021, इस अवधि में दो पार्ट में एपीएआर थी। पहली, एक अप्रैल 2020 से 5 अगस्त 2020 तक और दूसरी, 6 अगस्त 2020 से लेकर 31 मार्च 2021 तक थी। पहली एपीएआर में दोनों अफसरों ने गुड दे दिया। तब आईजी ने भी उसे स्वीकार कर लिया। 6 अगस्त 2020 के बाद दूसरे अफसर आ गए।
कमांडेंट वी राजू ने विकास की एपीएआर में आउटस्टेंडिंग दे दिया, लेकिन आईजी ने उसे घटाकर 'वेरी गुड' कर दिया। विकास ने 10 नवंबर 2019 को विभाग को प्रतिवेदन दिया, मगर उसे 15 फरवरी को 2021 को रिजेक्ट कर दिया गया। हीरानगर रेंज के डीआईजी को 15 जनवरी 2022 को दोबारा से प्रतिवदेन दिया गया। 2022 में वह दोबारा से रिजेक्ट हो गया। इसके बाद जनवरी 2023 में सीआरपीएफ डीजी को चार प्रतिवेदन दिए गए, लेकिन कोई निर्णय नहीं लिया जा सका।
जब टूआईसी विकास ने हाईकोर्ट की शरण ली तो जून 2023 में कोर्ट का आदेश आया। पहली एपीएआर को विभाग ने 'वेरी गुड' कर दिया। हालांकि 2018 और 2019 की एपीएआर का कुछ नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा, इसे अपग्रेड करें। विकास चौधरी ने अपनी शिकायत में कहा था कि दोनों अफसरों ने अपने अधीनस्थ अधिकारी के साथ प्रतिशोध और द्वेष का व्यवहार किया है।
विकास चौधरी की शिकायत पर कमांडेंट के खिलाफ 'कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी' भी हुई थी। जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि याचिकाकर्ता को वर्ष 2018-19 के दौरान, सीआरपीएफ की तरफ से सराहना मिली थी। कई प्रशंसा प्रमाण-पत्र मिले और डीजी की प्रशंसा डिस्क से भी उन्हें सम्मानित किया गया था। विकास चौधरी के करियर को बर्बाद करने के मकसद से कई दस्तावेज तैयार किए गए। केवल इसलिए कि विकास चौधरी ने दोनों अधिकारियों की भ्रष्ट और अनुचित गतिविधियों में शामिल होने से इनकार कर दिया था।