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Explainer: करोड़ों का बजट, फिर भी पानी-पानी मुंबई; क्या है हर साल की बाढ़ की असली वजह?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Mon, 06 Jul 2026 05:04 PM IST

सार

हर साल मानसून के दौरान मुंबई के कई इलाके जलभराव की चपेट में आ जाते हैं और लोगों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। करोड़ों रुपये खर्च होने और बाढ़ से निपटने के दावों के बावजूद यह समस्या लगातार बनी हुई है। आखिर इसके पीछे कौन-सी वजहें जिम्मेदार हैं, आइए समझते हैं।
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मुंबई का हाल बेहाल - फोटो : अमर उजाला

मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है और इसका नगर निगम बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) देश का सबसे अमीर नगर निकाय है। हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई, ड्रेनेज सिस्टम को मजबूत करने और बाढ़ से निपटने के दावे किए जाते हैं। इसके बावजूद जैसे ही तेज बारिश होती है, मुंबई के कई इलाके पानी में डूब जाते हैं, लोगों की जान चली जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि सबसे बड़े बजट और लगातार तैयारियों के बावजूद आखिर हर साल मुंबई क्यों डूब जाती है?



इस साल का क्या हाल?

इस बार भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। भारी बारिश के कारण शहर के कई हिस्सों में जलभराव हो गया। सड़कों पर पानी भर गया, अंडरपास डूब गए, ट्रैफिक की रफ्तार धीमी पड़ गई और लोकल ट्रेन सेवाएं भी प्रभावित रहीं। सायन समेत कई निचले इलाकों में लोगों को एक बार फिर बारिश से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा। लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि मुंबई में गर्मी की छुट्टियों की बजाय मानसून की छुट्टियां होनी चाहिए।



भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मौसम अलर्ट के बाद एहतियात के तौर पर 6 जुलाई को मुंबई विश्वविद्यालय ने अपनी सभी परीक्षाएं स्थगित कर दीं। निजी कंपनियों से कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम की सुविधा देने को कहा गया है। लोगों को हर आधे घंटे में अलर्ट संदेश भेजकर 8 से 10 जुलाई तक घरों में रहने की सलाह दी जा रही है।

बारिश का असर मुंबई-पुणे संपर्क मार्ग पर भी पड़ा। मुंबई-पुणे घाट सेक्शन में भूस्खलन होने से रेलवे ट्रैक पर बड़े पत्थर गिर गए, जिसके कारण कई ट्रेनें रद्द या डायवर्ट करनी पड़ीं। वहीं, मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे और पुराने मुंबई-पुणे हाईवे पर भी यातायात अगले आदेश तक रोक दिया गया। इसी बीच मानखुर्द के जनता नगर में ग्राउंड प्लस तीन मंजिला ढांचे के भीतर बनी दो से तीन झुग्गियां ढह गईं, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई।

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मुंबई का हाल बेहाल - फोटो : अमर उजाला
मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है और इसका नगर निगम बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) देश का सबसे अमीर नगर निकाय है। हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई, ड्रेनेज सिस्टम को मजबूत करने और बाढ़ से निपटने के दावे किए जाते हैं। इसके बावजूद जैसे ही तेज बारिश होती है, मुंबई के कई इलाके पानी में डूब जाते हैं, लोगों की जान चली जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि सबसे बड़े बजट और लगातार तैयारियों के बावजूद आखिर हर साल मुंबई क्यों डूब जाती है?



इस साल का क्या हाल?

इस बार भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। भारी बारिश के कारण शहर के कई हिस्सों में जलभराव हो गया। सड़कों पर पानी भर गया, अंडरपास डूब गए, ट्रैफिक की रफ्तार धीमी पड़ गई और लोकल ट्रेन सेवाएं भी प्रभावित रहीं। सायन समेत कई निचले इलाकों में लोगों को एक बार फिर बारिश से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा। लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि मुंबई में गर्मी की छुट्टियों की बजाय मानसून की छुट्टियां होनी चाहिए।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मौसम अलर्ट के बाद एहतियात के तौर पर 6 जुलाई को मुंबई विश्वविद्यालय ने अपनी सभी परीक्षाएं स्थगित कर दीं। निजी कंपनियों से कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम की सुविधा देने को कहा गया है। लोगों को हर आधे घंटे में अलर्ट संदेश भेजकर 8 से 10 जुलाई तक घरों में रहने की सलाह दी जा रही है।

बारिश का असर मुंबई-पुणे संपर्क मार्ग पर भी पड़ा। मुंबई-पुणे घाट सेक्शन में भूस्खलन होने से रेलवे ट्रैक पर बड़े पत्थर गिर गए, जिसके कारण कई ट्रेनें रद्द या डायवर्ट करनी पड़ीं। वहीं, मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे और पुराने मुंबई-पुणे हाईवे पर भी यातायात अगले आदेश तक रोक दिया गया। इसी बीच मानखुर्द के जनता नगर में ग्राउंड प्लस तीन मंजिला ढांचे के भीतर बनी दो से तीन झुग्गियां ढह गईं, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई।

बीएमसी - फोटो : Amar Ujala

मुंबई के कौन इलाके हर साल डूबते हैं?

मुंबई के कई इलाके ऐसे हैं जहां लगभग हर मानसून में जलभराव देखने को मिलता है। दादर का हिंदमाता, अंधेरी और मिलन सबवे, सायन, कुर्ला और मीठी नदी के आसपास के कई निचले इलाके वर्षों से बाढ़ संभावित क्षेत्रों में शामिल हैं। ये नए संवेदनशील इलाके नहीं हैं, बल्कि लंबे समय से जोखिम वाले क्षेत्र माने जाते रहे हैं।

जुलाई 2005 में 24 घंटे में 900 मिमी से अधिक बारिश हुई थी और मुंबई महानगर क्षेत्र में सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी। तब शहर को बाढ़ से बचाने के लिए स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज सिस्टम, पंपिंग स्टेशन, फ्लड वॉर्निंग सिस्टम, डी-सिल्टिंग अभियान और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर काम शुरू किया गया था। इसके बावजूद हर मानसून में जलभराव की तस्वीरें सामने आ जाती हैं।

मुंबई में जलभराव - फोटो : अमर उजाला

हर साल क्यों डूब जाते हैं ये इलाके?

भौगोलिक स्थिति: टोल प्लानिंग एक्सपर्ट और सामाजिक कार्यकर्ता संजय शिरोडकर बताते हैं कि हर मानसून में जलभराव की चपेट में आने की सबसे बड़ी वजह शहर की भौगोलिक स्थिति है। कई बाढ़ प्रभावित इलाके निचले स्तर पर स्थित हैं, जहां बारिश का पानी स्वाभाविक रूप से जमा हो जाता है। जब भारी बारिश के साथ समुद्र में हाई टाइड भी आता है, तब शहर का ड्रेनेज सिस्टम पानी को समुद्र तक नहीं पहुंचा पाता। नतीजतन पानी सड़कों, सबवे और रिहायशी इलाकों में भरने लगता है।

तेजी से बढ़ते शहरीकरण और जनसंख्या ने बढ़ाई समस्या: शिरोडकर ने कहा कि समय के साथ मुंबई में तेजी से शहरीकरण हुआ है। पहले जहां खुली जमीन बारिश के पानी को सोख लेती थी, वहीं अब उसकी जगह कंक्रीट की इमारतों और पक्की सड़कों ने ले ली है। इससे जमीन की पानी को प्राकृतिक रूप से सोखने की क्षमता काफी कम हो गई है, जिससे जलभराव की समस्या और बढ़ गई है। वहीं बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए बुनियादी ढांचे की कमी ने शहर पर दबाव बढ़ा दिया है। जितने लोग बढ़ेंगे कचरा उतना ही बढ़ेगा, लेकिन उसके निकलने का कोई रास्ता नहीं है।  संजय कहते हैं कि नियमित रखरखाव में ढील भी एक वजह है। ड्रेनेज सिस्टम की साफ-सफाई साल भर होनी चाहिए लेकिन इन्हें केवल मानसून के पहले साफ किया जाता है। 

मुंबई में जलभराव - फोटो : अमर उजाला

मीठी नदी से जुड़े इलाकों में क्यों बढ़ जाता है खतरा?

संजय शिरोडकर कहते हैं कि कुर्ला और मीठी नदी के आसपास के इलाकों में सिर्फ तेज बारिश ही बाढ़ की वजह नहीं होती। मीठी नदी और उससे जुड़े नालों की हालत भी इसके लिए जिम्मेदार होती है। हर साल मानसून से पहले नदी और नालों से गाद (मिट्टी) निकालने का काम किया जाता है, लेकिन इसके बावजूद हर बारिश में यहां जलभराव की समस्या बनी रहती है। साथ ही, नदी पर अतिक्रमण और पानी निकालने की कम होती क्षमता भी बाढ़ का खतरा बढ़ा देती है। उन्होंने कहा कि नदी जिस दिन से नाला बन गई है, उस दिन से यह समस्या बढ़ती चली जा रही है।

जलवायु परिवर्तन ने चुनौती और बढ़ा दी

विशेषज्ञों का मानना है कि अब मुंबई की बाढ़ की समस्या को केवल ड्रेनेज सिस्टम या रखरखाव से नहीं समझा जा सकता। जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक बारिश की घटनाएं पहले के मुकाबले अधिक बार और अधिक तीव्र हो रही हैं। शहर का अधिकांश बुनियादी ढांचा कई दशक पहले बनाया गया था। उस समय इतनी तीव्र और अधिक मात्रा में होने वाली बारिश को ध्यान में रखकर इसकी योजना नहीं बनाई गई थी। ऐसे में ड्रेनेज सिस्टम में सुधार होने के बाद भी बदलते मौसम के कारण उसकी क्षमता जल्दी कम पड़ जाती है। इसी वजह से जहां पुराने बाढ़ प्रभावित इलाके हर साल डूबते हैं, वहीं अब शहर के नए हिस्सों में भी जलभराव की घटनाएं बढ़ने लगी हैं।

जर्मनवॉच की क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026 के अनुसार, 1995 से 2024 के बीच जलवायु संबंधी आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित देशों में भारत 9वें स्थान पर रहा। इस दौरान अत्यधिक मौसम संबंधी घटनाओं के कारण देश में करीब 80 हजार लोगों की मौत हुई, जो दुनिया भर में ऐसी आपदाओं से हुई कुल मौतों का लगभग 9.6% है।
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