एक बहुत पुरानी कहावत है कि राजनीति में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और ना ही कोई स्थायी दुश्मन। पश्चिम बंगाल में इस महीने होने वाले पंचायत चुनावों में यह कहावत एक बार फिर चरितार्थ हो गई है। राज्य के नदिया जिले में तृणमूल कांग्रेस को शिकस्त देने के लिए एक दूसरे की धुर विरोधी भाजपा और माकपा ने जमीनी स्तर पर हाथ मिला लिया है।
माकपा की दलील, तृणमूल प्रत्याशी के खिलाफ विपक्ष का साझा उम्मीदवार चाहते थे गांव वाले
माकपा की दलील है कि गांव वाले तृणमूल प्रत्याशी के खिलाफ विपक्ष का साझा उम्मीदवार उतारने के पक्ष में थे। इस वजह से पार्टी को भाजपा के साथ सीटों के बंटवारे पर औपचारिक रूप से समझौता करना पड़ा। माकपा के जिला सचिव सुमित मानते हैं कि जमीनी स्तर पर कुछ सीटों पर तालमेल हुआ है। हालांकि उनका कहना है कि इस समझौते का माकपा की नीतियों से कोई लेना देना नहीं है।
भाजपा बोली, नदिया में दोनों दलों ने जमीनी हकीकत के मद्देनजर सीटों पर किया तालमेल
वहीं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष का भी मानना है कि नदिया में दोनों दलों के बीच कोई तालमेल हुआ है। दोनों दलों के नेताओं ने जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए सीटों पर तालमेल किया है। नदिया उत्तर के भाजपा अध्यक्ष महादेब सरकार का कहना है कि हमने जहां उम्मीदवार नहीं उतारे हैं वहां कार्यकर्ताओं ने निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन किया है। ज्यादातर निर्दलीय माकपा के उम्मीदवार हैं।
हालांकि जमीनी स्थिति यह है कि भाजपा ने कई ग्राम पंचायत इलाकों में अपने उम्मीदवार वापस ले लिए हैं ताकि वहां माकपा तृणमूल से सीधे मुकाबला कर सके। गौर करने वाली बात यह है कि माकपा हमेशा भाजपा को अलगाववादी ताकत बताती रही है। पिछले महीने दोनों दलों ने तृणमूल कांग्रेस की ओर से कथित हिंसा के विरोध में इलाके में एक साझा रैली आयोजित की थी।
भाजपा और माकपा में गोपनीय तालमेल : तृणमूल
तृणमूल कांग्रेस के महासचिव पार्थ चटर्जी ने इस घटनाक्रम पर कहा है कि नदिया के मामले से यह बिल्कुल साफ हो गया है कि माकपा और भाजपा के बीच गोपनीय तालमेल है।