सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस बात पर नाराजगी जताई कि उसके आदेश की मनचाही व्याख्या करते हुए कोरोना वायरस महामारी के नाम पर जेलों से बंदियों को पैरोल या जमानत पर रिहा करने में मनमानी की गई है। शीर्ष अदालत ने कहा, उसका मतलब हर विचाराधीन या दंडित बंदी को उसके अपराध की प्रकृति और गंभीरता को देखे बिना छोड़ देने का नहीं था।
कोरोना वायरस के वैश्विक महामारी घोषित होने के बाद 23 मार्च को शीर्ष अदालत ने जेलों में सोशल डिस्टेंसिंग की आवश्यकता का संज्ञान लिया था और राज्यों को एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर बंदियों को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था। रिहा करने से पहले बंदियों के अपराध की गंभीरता, जघन्यता और सजा की लंबाई समेत कई अन्य तथ्यों का ध्यान रखने के लिए कहा गया था।
चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने मंगलवार को बांबे हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका को खारिज करते हुए बंदियों की रिहाई में मनमानी करने पर चिंता जताई। बांबे हाईकोर्ट ने राज्य में बंदियों की रिहाई के लिए अपराधों के वर्गींकरण कई अन्य शर्तों का ध्यान उच्च स्तरीय समितियों को रखने के निर्देश दिए थे।
पीठ ने कहा, यह विकल्प केवल भीड़ को कम करने और वायरस को फैलने से रोकने की समस्या को हल करने के लिए दिया गया था। लेकिन इसके तहत सभी तरह के अपराधियों को बिना अपराध की तीव्रता आंके बिना रिहा नहीं किया जा सकता। दरअसल महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए 7 साल या उससे कम सजा वाले अपराधों में बंद सभी बंदियों को अंतरिम जमानत देने के आदेश दे दिए थे।