दरअसल, कोरोना वायरस एकाएक नहीं आया, इसके खतरे को 16 साल पहले यानी 2004 में ही भांप लिया गया था। अक्टूबर 2007 में प्रकाशित clinical biological review में स्पष्ट तौर पर यह जानकारी दी गई थी कि दक्षिण चीन में अजीब स्तनपायियों खासकर हॉर्सशू चमगादड़ खाने की आदत हमें बड़ी मुसीबत की ओर ले जा सकती है। इससे SARS के दोबारा लौटने और दूसरे खतरनाक वायरस के पनपने का शक जताया गया था।
2017 में भी एक पेपर प्रकाशित हुआ, जिससे पता लगा था कि चमगादड़ की चार अलग-अलग प्रजातियों, जिनमें से एक को उसके अजीबोगरीब नाक की वजह से हॉर्सशू बैट कहा जाता है, में कोरोना वायरस पाया गया है। अब मौजूदा वायरस से उस वायरस के 96% जीनोम (डीएनए) समान हैं, जो SARC में भी पाए गए थे।
एक निजी शोध संगठन इकोलिटिक्स अलायंस के अध्यक्ष, पीटर दासजक की माने तो वह इंसानों और जानवरों के बीच इस वायरस के कनेकश्न का पिछले 15 साल से पता लगा रहे हैं। SARS महामारी के बाद जब उनकी टीम ने युनान की उस गुफाओं के आसपास रहने वाले लोगों का ब्लड टेस्ट लिया तो मोटे तौर पर उनमें से 3% लोगों में ही रोगप्रतिरोधक क्षमता थी। मतलब ये वायरस चमगादड़ों से मनुष्यों के शरीर में बार-बार हमला करते हैं।
दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वुहान से दुनियाभर में फैली यह महामारी अचानक नहीं हुई बल्कि इसका पुराना इतिहास है। इस बात की भी पूरी संभावना है कि एक बार खत्म होकर यह दोबारा फिर लौट सकता है। मौजूदा हालातों में भोजन के लिए वन्य जीव को शामिल करना खतरे से खाली नहीं होगा। वैसे एशिया, अफ्रीका, यूएस और दुनिया के हर हिस्से में यह प्रचलित है।