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Illegal Arrest: अवैध गिरफ्तारियों के बढ़ते मामलों से अदालतें खफा, जांच एजेंसियों की साख पर सवाल; ऐसा क्यों?

Sun, 12 Jan 2025 02:13 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

हाल ही में अवैध गिरफ्तारी के मामलों में इजाफा हुआ है। अदालतें लगातार इस पर नाराजगी भी जाहिर कर रही हैं। इन अवैध गिरफ्तारियों से जांच एजेंसियों की साख पर सवाल खड़े होने लगे हैं। आइए जानते हैं कुछ ऐसे मामले जिसमें गिरफ्तारी पर जांच एजेंसी को कोर्ट से झटका लगा और ऐसा क्यों हो रहा?
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सीबीआई और ईडी। (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ANI
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विस्तार
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हाल ही में अवैध गिरफ्तारी के मामलों में इजाफा हुआ है। अदालतें लगातार इस पर नाराजगी भी जाहिर कर रही हैं। इन अवैध गिरफ्तारियों से जांच एजेंसियों की साख पर सवाल खड़े होने लगे हैं। कभी केस डायरी को ठीक न रखने तो कभी आरोपी को गिरफ्तारी का आधार न बताने पर कोर्ट ने जांच एजेंसियों को फटकारा। कभी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों का पालन न करने और गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर आरोपी को अदालत में पेश नहीं करने पर एजेंसियों को कोर्ट से झटका लगा। बीते छह महीनों में ही तमाम ऐसे मामले सामने आए जहां अदालतों ने ईडी, सीबीआई और स्थानीय पुलिस की रिमांड याचिकाओं को दिमाग का इस्तेमाल किए बिना की गई गिरफ्तारी का मामला बताकर खारिज किया। साथ ही आरोपियों को रिहा करने का आदेश दिया। आइए जानते हैं कुछ ऐसे मामले जिसमें गिरफ्तारी पर जांच एजेंसी को कोर्ट से झटका लगा और ऐसा क्यों हो रहा?...

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सीबीआई - फोटो : पीटीआई
केस डायरी मिली गड़बड़ी, रिहा किए गए आईआरएस अधिकारी
दिसंबर 2024 में सीबीआई ने रिश्वतखोरी के एक मामले में दो आईआरएस अधिकारियों सहित छह लोगों को गिरफ्तार किया था। लेकिन सीबीआई की विशेष अदालत ने उनकी गिरफ्तारी को अवैध मानते हुए आरोपियों की सीबीआई हिरासत से इनकार कर दिया और उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। इस मामले में पाया गया कि केस डायरी में कागजों की ढीली शीट थीं। बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार यह कानून का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी का इस पर ध्यान देना जरूरी है कि केस के सभी कागजात ठीक से रखे जाएं। 

ईडी अधिकारी की नहीं मिली ट्रांजिट रिमांड
एक अन्य रिश्वत मामले में अदालत ने ईडी अधिकारी की ट्रांजिट रिमांड देने से सीबीआई को इनकार कर दिया था। कोर्ट ने पाया था कि सीबीआई रिश्वत मामले में गिरफ्तार किए गए ईडी अधिकारी विशाल दीप की केस डायरी पेश नहीं कर सकी। अदालत ने गिरफ्तारी को अवैध ठहराते हुए इसे गंभीर चूक माना। साथ ही ट्रांजिट रिमांड देने से इनकार कर दिया।

ED - फोटो : ANI
मनी लॉड्रिंग मामले में व्यवसायी को किया गया था रिहा
पिछले साल मनी लॉड्रिंग मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपी व्यवसायी पुरुषोत्तम मंधाना को भी कोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया। यहां ईडी ने यह गलती की थी कि वह 70 वर्षीय व्यवसायी को दोषी बताने वाले दस्तावेज पेश करने में फेल रही। कोर्ट ने कहा था कि आरोपी को गिरफ्तार करने के कारण का कोई दस्तावेज अब तक नहीं मिला है। इसकी प्रति भी आरोपी को मुहैया नहीं कराई गई। कोर्ट ने आरोपी की गिरफ्तारी को अवैध मानते हुए आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया था।

पुलिस को भी लग चुका झटका
जांच एजेंसियों के साथ ही पुलिस भी अवैध गिरफ्तारियों के मामले में कोर्ट की नाराजगी झेल चुकी है। एक मजिस्ट्रेट अदालत ने नक्सलवाद पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के हालिया भाषण का एक छेड़छाड़ किया हुआ वीडियो ऑनलाइन पोस्ट करने के आरोपी व्यक्ति को रिहा करने का आदेश दिया था। इसके साथ एक मजिस्ट्रेट न्यायालय ने दुष्कर्म के आरोपी फिल्म निर्माता गुणवंत जैन की गिरफ्तारी को भी अवैध घोषित कर दिया था। क्योंकि अदालत ने पाया कि गिरफ्तारी के चार मिनट बाद आरोपी को बताया गया था कि उसे क्यों गिरफ्तार किया जा रहा? हालांकि बाद में सत्र न्यायालय ने आरोपी को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया।
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lawyer वकील new - फोटो : istock
न्यायालयों के आदेशों का नहीं हो रहा पालन
जांच एजेंसियों की साख पर उठ रहे सवालों को लेकर वकीलों ने अपनी राय साझा की। अभियोजन पक्ष के वकील कहते हैं कि जांच एजेंसियों का नपा तुला दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। जबकि बचाव पक्ष के वकील संविधान के मानदंडों का पालन करने पर जोर दे रहे हैं। वकील राहुल अग्रवाल कहते हैं कि जांच एजेंसियां कानून में निर्धारित प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय-उच्च न्यायालयों द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन नहीं कर रही हैं। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए कोई भौतिक आधार दिया जाना चाहिए अन्यथा गिरफ्तारी अवैध घोषित कर दी जाएगी। 

बिना दिमाए लगाए हो रहीं गिरफ्तारियां
वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश मानशिंदे भी कहते हैं कि ज्यादातर मामलों में गिरफ्तारियां बिना दिमाग लगाए की गईं। पता नहीं पुलिस अधिकारियों को पर्याप्त जानकारी नहीं है या वे अपना दिमाग नहीं लगाते हैं, इसलिए अभियोजन पक्ष प्राकृतिक न्याय और मौलिक अधिकारों के सिद्धांत का उल्लंघन कर रहा है। 

सरकारी वकील बोले- पीड़ितों के अधिकार भी अहम
सरकारी वकीलों की राय है कि पीड़ितों के अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। अगर जांच एजेंसियों ने गलती की है तो पीड़ित को क्यों भुगतना चाहिए? वरिष्ठ विशेष अभियोजक उज्ज्वल निकम संतुलित दृष्टिकोण की वकालत करते हैं। वे कहते हैं कि जांच एजेंसियों को भी आरोपियों से हिरासत में पूछताछ का अवसर मिलना चाहिए।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि गिरफ्तारी के आधारों के बारे में आरोपियों और उनके परिवार को भी सूचित किया जाना अनिवार्य है, ताकि आरोपियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खतरा न हो। इस प्रावधान में कुछ संशोधन करने का समय आ गया है क्योंकि कुछ आरोपियों को पकड़ना बहुत मुश्किल होता है और उनसे हिरासत में पूछताछ करना आवश्यक है। इसका मतलब दुर्व्यवहार नहीं है, बल्कि लगातार सवाल पूछना है।

एक अन्य विशेष लोक अभियोजक शिशिर हिरे भी पीड़ितों के अधिकारों की वकालत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि अगर कोई आरोपी फरार है, तो उसे पता है कि पुलिस उसके पीछे भाग रही है और उसे अपनी गिरफ्तारी का कारण भी पता है तो फरार आरोपियों पर यह मापदंड लागू नहीं कर सकते। हमें पीड़ित के बारे में चिंतित होने की जरूरत है। पीड़ितों के बारे में सोचना एक नया ब्रांड है जो उभर रहा है और यह आरोपी से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

सीबीआई का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता जितेंद्र शर्मा ने कहा कि अगर ऐसे मामलों का फैसला न्यायपालिका द्वारा किया जाता है, तो एक जांच एजेंसी सांठगांठ वाले भ्रष्टाचार के मामलों में कैसे जांच करेगी, जहां निजी और सरकारी कर्मचारी मिल-जुलकर काम करते हैं। गिरफ्तारी अवैध है या कानूनी यह न्यायपालिका का विशेषाधिकार है। साथ ही जांच एजेंसी को भी निष्पक्ष तरीके से जांच करनी होगी और उसे यह मौका देना चाहिए, अन्यथा इससे जांच में बाधा उत्पन्न होगी।
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