डिजिटलीकरण के दौर में न्यायिक कार्यवाहियों में कम्प्यूटरीकृत रिकॉर्ड पर बढ़ते भरोसे के बीच,
सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि न्याय के हित में इलेक्ट्रानिक साक्ष्यों को स्वीकार्य बनाने के लिए सर्टिफिकेट होना अनिवार्य नहीं है। शीर्ष अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी को स्पष्ट किया। यह धारा अदालती कार्यवाहियों में इलेक्ट्रानिक साक्ष्यों की स्वीकार्यता से संबंधित है। शीर्ष अदालत के इस आदेश का आपराधिक मामलों पर असर पड़ेगा जहां काल डिटेल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल वीडियो रिकार्डिंग और सीडी को बड़ी संख्या में साक्ष्य के रूप में स्वीकारा जा रहा है।
जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 बी (4) की व्याख्या करते हुए कहा कि इस प्रावधान को केवल तब लागू किया जाना चाहिए जब इलेक्ट्रानिक साक्ष्य ऐसे व्यक्ति की ओर से प्रस्तुत किया जाए जो खुद प्रमाणपत्र पेश करने की स्थिति में हो। कानून की धारा 65 बी कहती है कि इलेक्ट्रानिक रिकार्ड को किसी अदालती कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य योग्य बनाने के लिए किसी जिम्मेदार पद वाले व्यक्ति द्वारा प्रमाणित करने की जरूरत है। शीर्ष अदालत ने देश में अपराध स्थल की वीडियो रिकार्डिंग के मुद्दे पर गौर करते हुए इस सवाल पर विचार किया कि इलेक्ट्रानिक साक्ष्य को न्यायिक कार्यवाही में भरोसे के लिए स्वीकार किया जा सकता है या नहीं।