सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि दोषसिद्धि दर्ज करने के लिए मृत्यु से पहले का बयान एकमात्र आधार हो सकता है और अदालत को यह जांचना जरूरी है कि क्या यह सही और विश्वसनीय है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि किसी अदालत को इस बात की भी जांच करनी चाहिए कि क्या मृतक बयान देने से पहले शारीरिक और मानसिक रूप से फिट था और किसी भी दबाव में नहीं था। अगर मृत्यु पूर्व के बयानों में विसंगतियां होती हैं, तो मजिस्ट्रेट जैसे उच्च अधिकारी द्वारा दर्ज किए गए बयान पर भरोसा किया जा सकता है।
शीर्ष अदालत ने हालांकि कहा कि कोई भी ऐसी स्थिति नहीं होनी चाहिए जिससे इसकी सत्यता के बारे में कोई संदेह पैदा हो। न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा की पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी (दहेज हत्या) के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत को यह जांचना आवश्यक है कि क्या मृत्यु पूर्व बयान सच और विश्वसनीय है, क्या यह किसी व्यक्ति द्वारा ऐसे समय में दर्ज किया गया है जब मृतक घोषणा करने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ था, क्या यह किसी दबाव या बहकावे के तहत किया गया है।
अदालत ने कहा कि मृत्यु से पहले की घोषणा दोषसिद्धि दर्ज करने का एकमात्र आधार हो सकती है और अगर यह विश्वसनीय और भरोसेमंद पाई जाती है, तो किसी पुष्टि की आवश्यकता नहीं है। पीठ ने कहा कि यदि मृत्यु पूर्व बयान एक से अधिक हैं और उनके बीच विसंगतियां हैं, तो मजिस्ट्रेट जैसे उच्च अधिकारी द्वारा दर्ज की गई मौत की घोषणा पर भरोसा किया जा सकता है।