अदालत 'सदाचार' और 'नैतिकता' पर समाज को उपदेश देने की संस्था नहीं है। यह फैसले लेते समय कानून के शासन से बंधी होती है। सर्वोच्च न्यायालय ने शनिवार को दो बच्चों की हत्या की दोषी एक महिला को समय से पहले रिहा करने का आदेश देते हुए यह टिप्पणी की।
महिला का एक ऐसे व्यक्ति के साथ प्रेम संबंध था, जो अक्सर उसे धमकी देता था। इसलिए, उसने अपने बच्चों के साथ आत्महत्या करने का फैसला किया। उसने पौधों के लिए कीटनाशक खरीदा और अपने दोनों बच्चों को दे दिया। इसके बाद जब उसने खुद को खाने के लिए एक गिलास में कीटनाशक डाला, तो उसकी भतीजी ने उसे नीचे धकेल दिया। इसके बाद दोनों बच्चों को अस्पताल पहुंचने पर मृत घोषित कर दिया गया। मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
निचली अदालत ने महिला को आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और 309 (आत्महत्या) के तहत दोषी ठहराया और जुर्माने के अलावा आजीवन कारावास की सजा सुनाई। उच्च न्यायालय ने आईपीसी की धारा 309 के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए धारा 302 के तहत उसे बरी करके उसकी याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।
महिला ने समय से पहले रिहाई की गुहार लगाते हुए कहा था कि वह करीब 20 साल से जेल में है। हालांकि, राज्य स्तरीय समिति की सिफारिश को तमिलनाडु सरकार ने उसके द्वारा किए गए अपराध की क्रूर प्रकृति पर विचार करते हुए खारिज कर दिया था।
न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्ला की पीठ ने कहा कि महिला ने अपने अवैध संबंधों को जारी रखने के लिए अपने बेटों की हत्या करने की कोशिश नहीं की। बल्कि वह अपने प्रेमी साथ झगड़े के कारण निराशा और हताशा में थी। पीठ ने कहा, यह अदालत सदाचार और नैतिकता पर समाज को उपदेश देने वाली संस्था नहीं है और हम इस मामले में आगे कुछ नहीं कहते हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले को 'क्रूर अपराध के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है क्योंकि महिला खुद अपना जीवन समाप्त करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसे समय पर उसकी भतीजी ने रोक दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला की समय पूर्व रिहाई के लिए राज्य स्तरीय समिति की सिफारिश को राज्य द्वारा स्वीकार नहीं करने का कोई वैध कारण या न्यायसंगत आधार नहीं है।