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शीतकालीन सत्रः सांसदों ने ऐसा कुछ नहीं किया जिसके लिए उन्हें चुना गया

Fri, 16 Dec 2016 04:16 PM IST
प्रदीप सिंह / राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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संसद का शीतकालीन सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। जनप्रतिनिधियों ने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसके लिए मतदाता ने उन्हें चुनकर भेजा था। पर वह सारे काम किए जिनकी उनसे अपेक्षा नहीं की जाती। पिछले डेढ दो दशक से संसद में यह नजारा आम हो गया है। मतदाता करे क्या, जब सब शरीक-ए-जुर्म हों। किसी के हिस्से में कम और किसी के ज्यादा।
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देश बैंक की लाइन में चुपचाप खड़ा है और नेता संसद में खड़े होकर शोरगुल कर रहे हैं। भारतीय संसद में जो कुछ हो रहा है, वह किसी एक को दोषी ठहराने की स्थिति से आगे निकल गया है। क्योंकि जो सत्ता में होता है, वह सहयोग की बात करता है और विपक्ष में बैठा दल असहयोग को सबसे बड़ा संसदीय हथियार मानने लगा है।

संसद का सत्र शुरू हुआ तो उम्मीद थी कि केंद्र सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले पर सदन में गंभीर चर्चा होगी। विपक्ष सरकार को कटघरे में खड़ा करेगा और सरकार को बताना पड़ेगा कि उसे इस कदम से किस फायदे की उम्मीद है। यह भी कि लाइन में लगे आम लोगों की परेशानी दूर नहीं, तो कम कैसे होगी।
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लोकसभा में विपक्ष बहस सिर्फ ऐसे प्रावधान के तहत चाहता था, जिसमें मतदान हो। विपक्ष अपनी मांग पर अड़ा रहा और सरकार की जिद थी कि मतदान के नियम के तहत बहस नहीं होगी। लोकसभा में सत्तारूढ गठबंधन का दो-तिहाई बहुमत है, इसके बावजूद सरकार को विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं देना पड़ा और विपक्षी नेताओं को सरकार को घेरने के लिए कोई तैयारी नहीं करनी पड़ी।

ऐसे में भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी का सवाल वाजिब था कि सत्रावसान क्यों नहीं कर देते। एक महीने के हंगामे के बाद आखिर वही हुआ। बिना कोई खास कामकाज के संसद के शीतकालीन सत्र का सत्रावसान हो गया।
 

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विमुद्रीकरण के अड़तीस दिन हो गए हैं।

इस मुद्दे पर देश और दुनिया में चर्चा हो रही है। दुनिया भर के अर्थशास्त्री अपना सारा ज्ञान इकट्ठा करके बता रहे हैं कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है या बुरा। अखबारों ने इस पर हजारों टन कागज खर्च कर दिए हैं। टेलीविजन चैनलों पर इसके अलावा कोई खबर ही नहीं बची है। रात दिन इस पर बहस हो रही है या बैंकों के बाहर खड़े लोगों का हाल और उनकी राय बताई जा रही है।

लोगों के अपने-अपने तर्क हैं। समर्थक हों या विरोधी, एक अंतरधारा साफ नजर आती है कि लोगों के मन में नवधनाढ्यों के प्रति नफरत का भाव है। पर संसद की कार्यवाही देखकर कोई भी अंदाजा नहीं लगा सकता कि देश में इतना बड़ा मंथन चल रहा है।


संसद के बाहर सब बोल रहे हैं। प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा, इसलिए जनसभा में बोल रहे हैं। राहुल गांधी ललकार रहे हैं कि उन्हें संसद में बोलने दिया गया, तो भूचाल आ जाएगा। 
 

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आम आदमी के लिए समझना कठिन है कि कौन किसको नहीं बोलने दे रहा। जिस संसद में अगर पक्ष और विपक्ष दोनों नहीं बोल सकते, वह कितने दिन तक प्रासंगिक रहेगी। सांसदों का यह आचरण ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन संसदीय जनतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा। ऐसी नौबत आए उससे पहले सबकी नींद खुल जाय तो बेहतर है।

इसमें सबसे ज्यादा दुर्गति पीठासीन अधिकारियों की है। वे सदन को कैसे चलाएं, यह समझना कठिन हो रहा है। विपक्ष हो या सत्ता पक्ष, कोई सुनने को तैयार नहीं है। दरअसल समस्या यह है कि पिछले सात दशकों में देश की राजनीति बुनियादी रूप से बदल गई है। पर संसद के कामकाज के नियम नहीं बदले हैं। और परम्पराओं को निभाने की अब परम्परा नहीं रही।
 

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एक पुराना किस्सा है।

संसद में हिंदू कोड बिल पर बहस चल रही थी। माहौल गरम था। विपक्ष के एक नेता सरकार की आलोचना कर रहे थे। फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ बोलने लगे। नेहरू कुछ देर सुनते रहे और खीझते रहे। नहीं रहा गया, तो उठे और कहा कि जो बोलना हो बोलिए, बहुमत तो हमारे साथ है। विपक्षी सांसद ने कहा कि मुझे पता है कि बहुमत आपके साथ है,

लेकिन तर्क और सचाई मेरे साथ है। नेहरू फिर खड़े हुए और स्पीकर से कहा कि इनका संशोधन सरकार विधेयक में शामिल कर रही है। पर अब न तो वैसा सत्ता पक्ष रहा और न ही विपक्ष। अब समय आ गया है कि सभी पार्टियां और पीठासीन मिलकर बैठें और संसद की नियमावली को नये सिरे से बनाएं। क्योंकि राजनीति और राजनीतिक दल इस नियमावली के बहुत दूर चले गए हैं।

वैसे तो सदन का कार्यवाही सुचारु रूप से चले यह पीठासीन अधिकारी के अलावा मुख्यतौर पर सत्तारूढ दल की जिम्मेदारी है। संविधान निर्माताओं ने जब इसकी कल्पना की होगी, तो उन्होंने ऐसे सत्तारूढ दल और विपक्ष की तो शर्तिया कल्पना नहीं की होगी। जिम्मेदारी और जवाबदेही जैसे शब्द हमारी संसद के लिए बेमानी हो चुके हैं।
 
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सवाल है कि यह स्थिति बनी ही क्यों?

दरअसल जनआंदोलन में अब किसी पार्टी की न तो रुचि है और न ही माद्दा। राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने एक दिन हंगामे और नारेबाजी से तंग आकर पूछा कि सड़कों पर लगने वाले नारे संसद में क्यों लग रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यही है। जो नारे सड़कों पर लगने चाहिए वो संसद में लग रहे हैं। जो बात संसद में कही जानी चाहिए वह सड़कों पर कही जा रही है।
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