सरकार की ‘अडॉप्ट अ हेरिटेज’ योजना अपने शुरुआती चरण में ही विवादों में घिर गई है। इस योजना के तहत 90 से अधिक ऐतिहासिक राष्ट्रीय धरोहरें विभिन्न कॉरपोरेट घरानों को देखरेख के लिए सौंपी जानी हैं। ऐतिहासिक राष्ट्रीय धरोहर लाल किले को रख-रखाव और पुनर्विकास के लिए जिस तरह से औने-पौने दामों में डालमिया समूह को सौंपा गया है, उससे विभागीय भूमिका भी सवालों के घेरे में है।
हर साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान प्रधानमंत्री लाल किले से ही देश के लोगों को संबोधित करते रहे हैं। ऐसे में इसकी देखभाल की जिम्मेदारी से अगर केंद्र सरकार अपना पल्ला झाड़ रही है, तो यह एक राष्ट्रीय चिंता का विषय है। ‘अडॉप्ट अ हेरिटेज’ योजना के तहत लाल किले के रख-रखाव और पुनर्विकास की जिम्मेदारी
डालमिया समूह को एक पंचवर्षीय अनुबंध के तहत मात्र 25 करोड़ रुपये में सौंप दी है।
दिल्ली स्थित लाल किला एक प्रख्यात राष्ट्रीय पर्यटक स्थल है और यह विश्व पुरातत्व धरोहर स्थलों की सूची में भी शामिल है। इसकी वार्षिक आय छह करोड़ रुपये से ऊपर बताई जाती है। ऐसे में महज पांच करोड़ रुपये सालाना शुल्क पर किसी निजी कंपनी को एक राष्ट्रीय विरासत की देखभाल की जिम्मेदारी देने पर सवाल तो उठेंगे ही। यहां पर समुचित पर्यटकीय सुविधाएं बहाल करने वाले जरूरी फैसले लेने के बजाय इसे ‘विरासत गोद लें’ योजना के तहत महज 5 करोड़ रुपये सालाना निवेश की एवज में एक निजी कंपनी को सौंप देना कोई बुद्धिमानी भरा निर्णय नहीं लग रहा।