इनके प्रत्यर्पण का है इंतजार
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भगोड़ों के प्रत्यर्पण का मुद्दा पिछले काफी समय से चर्चा में रहा है। इसके कड़े नियम अपराधियों को कानून के कटघरे में खड़ा करने में बाधा पैदा करते हैं। कोई आरोपी एक देश में अपराध को अंजाम देकर दूसरे देश जा पहुंचता है और उसे वापस लाकर सजा देना बेहद मुश्किल हो जाता है। खासतौर पर भारत जैसा देश इसे खासा भुगत रहा है। विजय माल्या, मेहुल चोकसी, नीरव मोदी, ललित मोदी और जाकिर नाइक जैसे कई आरोपी कमजोर प्रत्यर्पण कानून की आड़ में अब तक बचे हुए हैं।
माल्या-चोकसी-जाकिर का मामला
ब्रिटेन की कोर्ट ने विजय माल्या को भारत प्रत्यर्पण किए जाने के खिलाफ अपील करने की इजाजत दे दी है। वहीं एंटीगुआ में मेहुल चोकसी की नागरिकता खत्म करने की बात कही जा रही है, लेकिन प्रत्यर्पण पर भी बातचीत जारी है। मलेशिया सरकार ने भी भारत को आश्वस्त किया है कि जाकिर नाइक के प्रत्यर्पण पर विचार हो रहा है।
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने भगोड़े शराब कारोबारी विजय माल्या की याचिका को खारिज कर दिया था। उसने अपील की थी कि सरकारी एजेंसियों को उसके या संपत्तियों के खिलाफ कार्रवाई से तब तक रोका जाए जब तक कि भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित करने के मामले में उच्च न्यायालय का फैसला आए। ब्रिटेन की स्थानीय कोर्ट ने माल्या को इस बात की इजाजत दी थी कि वह भारत को प्रत्यर्पण किए जाने के खिलाफ अपील कर सकता है।
वहीं जांच एजेंसियों ने सरकार के सामने ललित मोदी के भी प्रत्यर्पण की मांग रखी है। इसी तरह पंजाब नेशनल बैंक से करीब 14 हजार करोड़ रुपए की धोखाधड़ी करने वाले हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी के मामले में भी एंटीगुआ सरकार ने नागरिकता को खारिज करने का फैसला किया है। इसके बाद भगोड़े हीरा कारोबारी को भारत लाने की कार्रवाई में तेजी आ गई है और उसे जल्द ही भारत में लाया जाएगा।
इस बीच मलेशिया सरकार ने भारत को सूचित किया है कि अपील पर विचार किया जा रहा है। हालांकि अब तक सरकार के प्रयासों पर प्रत्यर्पण का इतिहास भारी नजर आ रहा है। भारत की जिन 42 देशों के साथ ऐसी संधि है, वहां से पिछले 14 साल में सिर्फ 60 ही आरोपी हमारी जांच एजेंसियों को सौंपे गए हैं। इतना ही नहीं ब्रिटेन ने तो 1993 में करार के बाद से अब तक कोई हाई-प्रोफाइल आरोपी भारत को नहीं सौंपा।
संसद में बिल पास
आर्थिक अपराध को अंजाम देने के बाद देश छोड़कर भागने वाले अपराधियों को रोकने के लिए संसद ने पिछले साल एक बिल पास किया था। तत्कालीन रेलमंत्री (वित्त मंत्रालय के प्रभार के साथ) रहे रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि हमारी सरकार विश्व के सारे देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि को लेकर सहयोग की ओर अग्रसर है।
उन्होंने कहा था कि इस तरह के मामलों को रोकने के लिए हमारी 48 देशों के साथ पहले से ही प्रत्यर्पण संधि है लेकिन दुनिया के अन्य देशों के साथ ही इस प्रकार की संधि करने के लिए सरकार अग्रसर है। पीयूष गोयल ने कहा था कि केंद्र सरकार इस प्रयास में लगी हुई है कि जो आर्थिक अपराधी देश छोड़कर विदेश में है उसका किसी प्रकार जल्द प्रत्यर्पण किया जा सके।
- ललित मोदी - 1900 करोड़ रुपये
- नीरव मोदी - 11 हजार करोड़ रुपये
- विजय माल्या - नौ हजार करोड़ रुपये
- मेहुल चौकसी - 13 हजार करोड़ रुपये
ब्रिटेन के पास भारत के 131 आरोपियों की सूची
भारत और ब्रिटेन के बीच 1993 में प्रत्यर्पण संधि हुई थी। तब से अब तक ब्रिटेन की तरफ से एक भी आरोपी देश को नहीं सौंपा गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत के 131 वांछित लोगों की सूची ब्रिटेन के पास है। पिछले कुछ वर्षों में तो ब्रिटेन की ओर से कई गंभीर मामलों के आरोपियों की प्रत्यर्पण याचिका नामंजूर कर दी गई है।
इनमें नौसेना वॉर रूम से सूचनाएं लीक करने का आरोपी रवि शंकरन, 1993 में गुजरात में हुए दो बम धमाकों का आरोपी टाइगर हनीफ, गुलशन कुमार की हत्या का आरोपी म्यूजिक डायरेक्टर नदीम शरीफ शामिल हैं। साथ में भ्रष्टाचार के आरोपी आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी को भी भारत लाने के सरकार के प्रयासों को सफलता नहीं मिली।
भारत की जिन 42 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि है, वहां से पिछले 14 साल में सिर्फ 60 ही आरोपी हमारी जांच एजेंसियों को सौंपे गए हैं। इतना ही नहीं, ब्रिटेन ने तो 1993 में करार के बाद से अब तक कोई हाई-प्रोफाइल आरोपी भारत को नहीं सौंपा।
इस तरह होती है दो देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि
प्रत्यर्पण असल में किसी देश द्वारा आरोपी या अपराधी का दूसरे देश के सामने समर्पण है। यह काम दो देशों के बीच संधि के माध्यम से होता है। जब विदेश मंत्रालय के पास जांच एजेंसियां किसी आरोपी के प्रत्यर्पण की मांग भेजती हैं तो मंत्रालय उस देश के विदेश मंत्रालय के सामने मांग रखता है, जहां आरोपी या अपराधी रह रहा है। इस मांग के साथ आरोपी से जुड़ी सारी जानकारी भी भेजी जाती है। अगर आरोपी एक से ज्यादा हैं तो हर एक के लिए अलग रिक्वेस्ट भेजी जाती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये परिस्थितियां हैं मान्य
आमतौर पर आरोपियों के प्रत्यर्पण में इस बात का ध्यान दिया जाता है कि उस पर लगे आरोपों के तहत दोनों ही देशों में सजा का प्रावधान हो। जिस देश में आरोपी ने शरण ले रखी है, अगर वहां सजा का प्रावधान नहीं है तो संबंधित देश आरोपी को सौंपने से इनकार कर सकता है। यही वजह है कि ज्यादातर मामलों में राजनीतिक कारणों से आरोपी बनाए गए शख्स का प्रत्यर्पण नहीं होता।
ज्यादातर हत्या के आरोपी ही संधि के तहत पकड़े गए हैं
विभिन्न देशों से संधि के तहत जो आरोपी भारत के हाथ लगे हैं, उनमें से ज्यादातर हत्या के मामलों में लिप्त हैं। इसके बाद दूसरी बड़ी संख्या आतंक फैलने व बम धमाकों में शामिल लोगों की है। इसके अलावा 8 ऐसे हैं जो आर्थिक अनियमितता के बाद विदेश भाग गए थे। इस सूची में तीन-तीन आरोपी बच्चों के यौन शोषण व देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने के हैं।
ये धाराएं साबित हो रहीं 'भगोड़ों' की मददगार
यूरोपियन कंवेंशन ऑफ ह्यूमन राइट्स की धारा-8: कई बार आरोपी यह तर्क भी देता है कि देश वापस भेजने पर उनसे मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा सकता है। कुछ गंभीर मामलों के आरोपी तो भारत में सजाए मौत के कानून का भी हवाला देते हैं। तब यूरोपियन कन्वेंशन ऑफ ह्यूमन राइट्स की धारा-8 उसकी मदद करती है। यूरोपीय देशों के बीच 1950 में हुई संधि की यह धारा व्यक्ति को निजी व पारिवारिक जीवन में सम्मान का अधिकार देती है। इसी बहाने ब्रिटेन ने कई बार प्रत्यर्पण का हमारा अनुरोध अस्वीकार किया है।
भारत-ब्रिटेन प्रत्यर्पण संधि की धारा-9: ब्रिटेन जाकर शरण लेने वालों की तरफ से हमेशा तर्क दिया जाता है कि भारत सरकार और जांच एजेंसियां उनके प्रति दुर्भावनापूर्वक काम कर रही हैं। इस बहाने उन्हें प्रत्यर्पण संधि की धारा-9 का फायदा मिलता है। इसके तहत भारत सरकार को यह साबित करना होता है कि आरोपी को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि कानून के तहत मांगा जा रहा है। ऐसे में सरकार को ब्रिटेन में अदालती प्रक्रिया से गुजरना होता है। यह प्रकिया निचली से शुरू होकर ऊपरी कोर्ट तक जा सकती है और वर्षों बीत जाते हैं।
इन देशों के साथ संधि: भारत की फिलहाल 42 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि है। इनमें सबसे पुरानी बेल्जियम के साथ है, जो 1958 में हुई थी। इसके बाद से 2011 तक हम कुल 31 देशों के साथ संधियां कर चुके थे। वहीं पिछले पांच साल में 11 और देश इस सूची में शामिल हो चुके हैं। इनके अलावा 9 देश ऐसे भी हैं, जिनके साथ हमने संधि तो नहीं की, लेकिन प्रत्यर्पण के लिए समझौता किया है। इनमें फिजी, इटली, पापुआ न्यू गिनी, पेरू, सिंगापुर, श्रीलंका, स्वीडन, तंजानिया व थाइलैंड शामिल हैं।
14 साल में 19 देशों ने भारत को 60 आरोपी लौटाए हैं, इनमें से 52 भारतीय हैं, जबकि तीन ब्रिटिश और एक अमेरिकी है। इनमें से सबसे ज्यादा आरोपी यूएई ने लौटाए हैं। यूएई से 17 आरोपी लौटाए हैं जबकि अमेरिका ने 11, सऊदी अरब ने 5, कनाडा ने 4, थाईलैंड ने 4, जर्मनी ने 3, बेल्जियम ने 2, मॉरिशस ने 2, पुर्तगाल ने 2 आरोपी ही लौटाए हैं। 10 आरोपी आतंक फैलाने व बम धमाकों के हैं। 13 हत्या के आरोपी 14 साल में प्रत्यर्पित हुए हैं।
क्या होती है प्रत्यर्पण संधि
प्रत्यर्पण संधि दो देशों के बीच होने वाली वह संधि है, जिसके अनुसार देश में अपराध करके किसी दूसरे देश में जाकर रहने वाले अपरधियों को उस देश को लौटा दिया जाता है। भारत की 47 देशों के साथ पहले से ही प्रत्यर्पण संधि है, लेकिन दुनिया के अन्य देशों के साथ ही इस प्रकार की संधि करने के लिए सरकार अग्रसर है। केंद्र सरकार इस प्रयास में लगी हुई है कि जो आर्थिक अपराधी देश छोड़कर विदेश में हैं, उसका किसी प्रकार जल्द प्रत्यर्पण किया जा सके।
62 भगोड़ों का हो चुका है प्रत्यर्पण
आर्थिक अपराध को अंजाम देने के बाद देश छोड़कर भागने वाले अपराधियों को रोकने के लिए संसद ने एक बिल पास किया था। इसी के अनुसार हमारी सरकार विश्व के सारे देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि को लेकर सहयोग की ओर अग्रसर है। भारत सरकार की नीति है कि जितने अधिक देशों के साथ संभव हो, प्रत्यर्पण संधियां की जाएं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भगोड़े अपराधी कानून के शिकंजे से बच नहीं सकें। वर्ष 2002 से अब तक 62 भगोड़े अपराधियों का प्रत्यर्पण भारत को सफलतापूर्वक किया जा चुका है।
इस तरह होती है डील
प्रत्यर्पण असल में किसी देश द्वारा आरोपी या अपराधी का दूसरे देश के सामने समर्पण है। यह काम दो देशों के बीच संधि के माध्यम से होता है। जब विदेश मंत्रालय के पास जांच एजेंसियां किसी आरोपी के प्रत्यर्पण की मांग भेजती हैं तो मंत्रालय उस देश के विदेश मंत्रालय के सामने मांग रखता है, जहां आरोपी या अपराधी रह रहा है। इस मांग के साथ आरोपी से जुड़ी सारी जानकारी भी भेजी जाती है। अगर आरोपी एक से ज्यादा हैं तो हर एक के लिए अलग रिक्वेस्ट भेजी जाती है।
ये परिस्थितियां मान्य
आमतौर पर आरोपियों के प्रत्यर्पण में इस बात का ध्यान दिया जाता है कि उस पर लगे आरोपों के तहत दोनों ही देशों में सजा का प्रावधान हो। जिस देश में आरोपी ने शरण ले रखी है, अगर वहां सजा का प्रावधान नहीं है तो संबंधित देश आरोपी को सौंपने से इनकार कर सकता है।
2016 में हुआ ब्रिटेन से पहला प्रत्यर्पण
प्रत्यर्पण संधि तब से लेकर अब तक पहले आरोपी को भारत लाने में 23 साल लग गए। इसमें हत्या के मामले में सिर्फ एक आरोपी समीरभाई वीनूभाई पटेल को 19 अक्टूबर 2016 को प्रत्यर्पण कर भारत लाया गया था। बाकी 13 आरोपियों को अलग-अलग अपराधों में प्रत्यर्पित कर लाया गया। भारत अलग-अलग अपराधों में जिन 62 लोगों को प्रत्यर्पित कर लाया है, उनमें सबसे ज्यादा 15 हत्या के आरोपी हैं। वहीं दूसरी ओर आतंकवाद के मामले में भी 9 आरोपी प्रत्यर्पण संधि के तहत लाए गए हैं।