'दीदी' के विकास के दावे में दिखा दम
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पश्चिम बंगाल में अपने विरोधियों को परास्त करके फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के लिए तैयार ममता बनर्जी के काम करने का दावा आखिरकार काम कर ही गया। वहीं विरोधियों की तरफ से उठाए गए भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उनको लोगों का साथ नहीं मिला। पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव परिणाम इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को 45 फीसदी से ज्यादा वोट प्राप्त हुए हैं।
चुनावों में ममता बनर्जी अपने कामों को लेकर जनता के बीच गई और उसी के नाम पर वोट मांगा। दूसरी तरफ राज्य की प्रमुख विरोधी पार्टी सीपीआई और कांग्रेस गठबंधन ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाया। पर उन्हें कामयाबी नहीं मिल पाई।
ममता बनर्जी के पिछले शासन के दौरान सारदा चिट फंड स्कैम और नारदा स्टिंग ऑपरेशन में टीएमसी नेताओं के फंसने पर पार्टी की खूब फजीहत हुई। नारदा स्टिंग ऑपरेशन में तो टीएमसी के 11 नेता वोटिंग को लेकर रिश्वत लेते हुए पकड़े गए थे। पश्चिम बंगाल के शहरी क्षेत्रों में इस बात काफी असर हुआ था। पर ग्रामीण क्षेत्रों में ये स्टिंग कोई खास असर नहीं डाल पाया।
चुनावी रैलियों में भी ममता बनर्जी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अधिकतर शांत ही दिखाई पड़ी। बाद में एक चुनावी सभा में उन्होंने स्वीकार किया था कि अगर उन्हें इस मामले की जानकारी पहले होती तो वो पहले ही टिकट बंटवारे के दौरान इस बात का ध्यान रखती।
ममता बनर्जी ने कई बार खुले मंच पर साफ तौर पर मतदाताओं से कहा कि आप मुझे वोट दीजिए न कि मेरे पार्टी के सदस्यों को। यह कहकर लोगों से अपील करती रही कि मुझे एक बार फिर से मौका दीजिए।
जब लोगों की राय जानने की कोशिश गई तो लोगों ने कहा कि उन्होंने एक विकास का काम करने वाले मुख्यमंत्री को वोट दिया है।