कोरोना वैक्सीन
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- जांच-पड़तालः इसमें यह पता लगाया जाता है कि वायरस कोशिकाओं को कैसे प्रभावित करता है। फिर यह देखा जाता है कि क्या इम्यून सिस्टम बढ़ाने के लिए उसी वायरस प्रोटीन का प्रयोग हो सकता है या नहीं? फिर एंटीजन की पहचान कर एंटीबॉडीज बनाया जाता है।
- प्री-क्लिनिकल: इंसानों पर ट्रायल से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि वह वैक्सीन सुरक्षित है या नहीं। पहले इन्हें जानवरों पर परीक्षण किया जाता है। यहां सफलता मिलने के बाद ही आगे बढ़ा जाता है।
क्लिनिकल ट्रायल : इसके तहत इंसानों पर परीक्षण किया जाता है। इसके भी तीन चरण हैं।
- पहले चरण में 18 से 55 साल के 20-100 स्वस्थ लोगों पर परीक्षण किया जाता है। देखा जाता है कि इम्यूनिटी बन रही है या नहीं।
- दूसरे चरण में 100 से ज्यादा इंसानों पर ट्रायल किया जाता है। इस चरण में बच्चों और बुजुगों को भी शामिल किया जाता है ताकि असर का पता चल सके।
- तीसरे चरण में सैकड़ों लोगों पर दवा का ट्रायल किया जाता है। अगर सब कुछ सही रहता है तो ही वैक्सीन की सफलता की घोषणा की जाती है।