एम्स के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया ने भी फाइजर-बायोएनटेक द्वारा तैयार कोरोना वैक्सीन को लेकर चिंता जाहिर की है। गुलेरिया ने कहा कि भारत के ग्रामीण इलाकों में इस वैक्सीन को स्टोर करने के लिए संसाधन का अभाव है। इस कारण इस वैक्सीन का देश में प्रयोग काफी मुश्किल नजर आ रहा है।
दूसरी तरफ, कम विकसित देशों तक वैक्सीन की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए यूनिसेफ खुद को तैयार करने में जुट गया है। यूनिसेफ ने लक्ष्य रखा है कि वह करीब एक अरब वैक्सीन और इससे जुड़ी चीजों के रख-रखाव को लेकर साजो-सामान तैयार करेगा।
यूनिसेफ ने कहा था कि वह वैक्सीन के सामने आने पर हर देश तक इसे उपलब्ध कराने के लिए तैयारी करेगा। वैक्सीन की उपलब्धता को लेकर जरूरी चीजों को खरीदने का काम भी जारी है। वैश्विक स्तर पर इस काम को तेज रफ्तार से अंजाम देने के लिए संगठन जी-तोड़ मेहनत कर रहा है। हालांकि, इसके बाद भी डब्ल्यूएचओ की चिंता को नजरअंदाज करना मुश्किल है।
ये एक नई तरह की एमआरएनए कोरोना वैक्सीन है, जिसमें महामारी के दौरान इकट्ठा किए कोरोना वायरस के जेनेटिक कोड के छोटे टुकड़ों को इस्तेमाल किया गया है। कंपनी के अनुसार जेनेटिक कोड के छोटे टुकड़े शरीर के भीतर रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाते हैं और कोविड-19 के खिलाफ शरीर को लड़ने के लिए तैयार करते हैं। इससे पहले तक मानव शरीर पर प्रयोग के लिए एमआरएनए वैक्सीन को मंजूरी नहीं दी गई है। हालांकि क्लिनिकल ट्रायल के दौरान लोगों को इस तरह की वैक्सीन के डोज दिए गए हैं।
वैक्सीन को मानव शरीर में इंजेक्ट किया जाता है। ये इम्यून सिस्टम को कोरोना वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाने और टी-सेल को सक्रिय कर संक्रमित कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए कहती हैं। इसके बाद अगर व्यक्ति कोविड-19 से संक्रमित होता है तो उसके शरीर में बनी एंटीबॉडी और टी-सेल वायरस से लड़ने में जुट जाती हैं। वैक्सीन को-70 डिग्री पर स्टोर करना होता है और इन्हें खास डिब्बों में पैक करना होता है।