देश में कोरोना वायरस की लड़ाई के दौरान दिल्ली-एनसीआर से सटा हरियाणा का 'मेवात' इलाका चर्चा में आ गया। वजह थी, यहां पर निजामुद्दीन मरकज में शामिल होकर खासी संख्या में लोगों का वापस पहुंचना। इसके चलते प्रदेश में कोरोना वायरस के मामलों का ग्राफ तेजी से ऊपर चला गया।
ये भी कहा गया कि मरकज से लौटे मेवाती जांच से बच रहे हैं। कहीं पर स्वास्थ्य विभाग के साथ अभद्रता करने की बात सामने आई। ऐसा क्यों हुआ या कहा गया, इसके पीछे सामाजिक विडंबना की एक कहानी है। मेवात की कहानी। मेवातियों के लफ्जों में अगर कहें तो हम तो 11वीं सदी के राजपूत थे, अब बदले हुए मुसलमान हैं।
इस इलाके में शिक्षा साक्षरता की कमी है, रोजगार न के बराबर है तो गरीबी भी है। इस वजह से बहुत से लोग मरकज का रुख कर लेते हैं, इस यकीन के साथ कि वहां 40 दिन की पक्की रोटी मिलेगी। अब कोरोना ने इस इलाके की सामाजिक आर्थिक हकीकत की बंद परतें खोल कर सामने रख दी हैं।
कोरोना के फैलने या फैलाने, बाबत कुछ समझना है तो पहले मेवात को जानना होगा: महमूद खान
अमेरिका, ब्रिटेन, हॉलैंड और दूसरे कई देशों में लंबे समय तक रहे, यूनिलीवर जैसी ग्लोबल कंपनी में बड़े पदों पर काम कर चुके महमूद खान जो कि अब मेवात में जैविक खेती के द्वारा लोगों की गरीबी दूर करने के प्रयास में लगे हैं, ने अमर उजाला डॉट कॉम के साथ विस्तार से बातचीत की है।
आईआईएम अहमदाबाद से शिक्षा पा चुके महमूद खान बताते हैं कि आपको कोरोना के फैलने या फैलाने बाबत कुछ समझना है तो पहले मेवात को जानना होगा। यहां रहने वाले अधिसंख्य मेवाती 11वीं सदी के राजपूतों के वंश से निकले हैं। इनमें कुछ जाट, गुर्जर और मीणा भी हैं। मैं कन्हैया जी के खानदान से हूं और दूसरे बहुत से लोग रामचंद्र जी के वंशज हैं।
मशहूर सूफी फकीर ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती जिनकी दरगाह अजमेर शरीफ पर लाखों लोग सिर झुकाते हैं, के समय यहां धर्म परिवर्तन हुआ था। वेदों में यकीन रखने वाले अनेक लोगों को कलमा पढ़ा दिया गया। मुस्लिमों की परंपराओं का निर्वहन करने में दिक्कतें आईं। जैसे शुरू में डर लगा कि शव को दफनाएंगे तो कोई उसके साथ शरारत कर सकता है।
इसके लिए चिश्ती ने गांव में मियां नियुक्त कर दिए। इनका काम दफनाने वाली जगह की एक सप्ताह तक रखवाली करना था। बाद में मियां ने ये काम करने से मना कर दिया। बोले हम, इन लोगों को स्वीकार नहीं करेंगे। इनका अलग समुदाय बना दिया गया। अब वे लोग मेव बन चुके थे। रायसीना से लेकर खान्वा तक करीब 12 सौ गांवों में सवा लाख मेव बसाए गए, ये सब वे थे, जिन्होंने कलमा पढ़ा था।