मुंबई स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी (आईसीटी) के शोधकर्ताओं ने इस तरह के रसायनों के छिड़काव के लिए खास नोजल डिजाइन किए हैं, जिन्हें आवश्यकता के अनुसार उपयोग किया जा सकता है।
सैनिटाइजर टनल में एक व्यक्ति को संक्रमण मुक्त करने में औसतन आठ सेकेंड का समय लगता है। अगर 0.5 प्रतिशत सॉल्यूशन का मिस्ट सैनिटाइजर में आठ सेंकेंड तक छिड़काव किया जाए तो सिर्फ 0.00133 मिलीग्राम हाइपोक्लोराइट के संपर्क में आने की संभावना होती है।
नोजेल से पूरी टनल में समान रूप से सूक्ष्म बूंदों के छिड़काव का समान वितरण भी नुकसान से बचाने में मददगार होता है। द्रव कण बनाने के लिए फिल्टर की हुई हवा का उपयोग टनल में घुटन की आशंका से बचा जा सकता है।
सोडियम हाइपोक्लोराइट के दुष्प्रभाव न होने के बावजूद सीएसआईआर-एनसीएल के वैज्ञानिकों ने कहा है कि टनल से गुजरने के दौरान सुरक्षा की दृष्टि से फेस शील्ड या सेफ्टी गॉगल्स का उपयोग किया जा सकता है। टनल से गुजरकर सैनिटाइज करने की प्रक्रिया हैंड-सैनिटाइजर या साबुन से हाथ धोने के बाद पूरी होती है।
मिस्ट सैनिटाइजर के उपयोग से जुड़ी नकारात्मक खबरों पर प्रतक्रिया देते हुए सीएसआईआर-एनसीएल के निदेशक प्रोफेसर अश्विनी कुमार नांगिया और आईसीटी, मुंबई के वाइस चांसलर प्रोफेसर ए.बी. पंडित ने अपने संयुक्त वक्तव्य में कहा है कि हर चीज की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है और रसायनों के उपयोग पर यह बात सबसे अधिक लागू होती है। कई स्थानों पर मिस्ट सैनिटाइजर में निर्धारित मात्रा से 100 गुना अधिक तक सोडियम हाइपोक्लोराइट का उपयोग किया गया, जिससे नुकसान स्वाभाविक है।
आईसीटी मुंबई ने सोडियम हाइपोक्लोराइट से एलर्जी वालों के लिए एक विकल्प सुझाया है। ऐसे लोगों को संक्रमण रहित करने के लिए बेंजैलकोनियम क्लोराइड (बीकेसी) आधारित सॉल्यूशन का छिड़काव किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सही पद्धति की जानकारी हो और उस पर उपयुक्त ढंग से अमल किया जाए, तो बिना किसी नुकसान के रोगजनक सूक्ष्मजीवों से बचा जा सकता है।