कोरोना वायरस के मामले फिर से बढ़ने के साथ ही सरकार के सुपर मॉडल पर भी सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों ने पिछले वर्ष सुपर मॉडल को जारी करते हुए दावा किया था कि फरवरी, 2021 तक देश में सक्रिय मरीजों की संख्या 20 हजार रह जाएगी और दोबारा संक्रमण की लहर का सामना नहीं करना पड़ेगा।
इससे पहले भी सरकार के गणितीय आकलन पर सवाल खड़े हो चुके हैं। पिछले वर्ष नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके पॉल ने ग्राफ के जरिए दावा किया था कि जून तक कोरोना नियंत्रण में आ जाएगा, जबकि सितंबर तक स्थिति अलग ही रही। हालांकि, इसे लेकर बाद में डॉ. पॉल ने स्पष्टीकरण दिया था।
इसके बाद भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) सहित देश के शीर्ष संस्थान के विशेषज्ञों ने मिलकर सुपर मॉडल जारी किया था, जिसे लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2021 के शुरुआती दिनों में ही कोरोना को नियंत्रण कर टीकाकरण को बढ़ाने का दावा किया था।
इसे लेकर आईआईटी के पूर्व प्रोफेसर रिजो एम जॉन ने कहा, सुपर मॉडल के जरिए विशेषज्ञों ने कोरोना संक्रमण की पहली लहर को लेकर अनुमान एकदम सटीक लगाया था, लेकिन इस अनुमान में उन्होंने संक्रमण की दूसरी या तीसरी लहर को स्थान नहीं दिया।
फरवरी तक संक्रमण के मामले कम होने की पुष्टि की थी, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर को लेकर बात करें तो यह सुपर मॉडल फेल साबित हुआ। वर्तमान में हालात यह हैं कि 0.17 फीसदी की रफ्तार से संक्रमण दर बढ़ रही है। पिछले सात दिन में प्रतिदिन औसतन 7.4 लाख सैंपल की जांच हो रही है, जबकि 2.62 फीसदी सैंपल कोरोना संक्रमित मिल रहे हैं।
गंगाखेड़कर बोले, गणितीय आकलन पर नहीं कर सकते ज्यादा भरोसा
वहीं आईसीएमआर के पूर्व संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. आर गंगाखेड़कर का कहना है कि किसी भी प्रकार की बीमारी या संक्रामक रोग को लेकर गणितीय आकलन पर बहुत अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता है।
हालांकि, सुपर मॉडल के जरिए जो संभावना व्यक्त की गई थी उसमें काफी हद तक सच्चाई भी देखने को मिली है। अगर टीकाकरण के आंकड़े देखें तो जिन राज्यों में मध्यम गति से टीकाकरण शुरू हुआ है वहां दूसरी लहर का असर दिखाई दे रहा है। सुपर मॉडल की संभावनाएं कहीं हद तक पूरी हुई हैं, लेकिन यह कहना भी ठीक नहीं है कि इस आकलन के भरोसे पर ही सरकार ने योजनाओं पर काम किया है।