कोरोना वायरस: सैंपल लेता कर्मचारी
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कोरोना की दूसरी लहर के दौरान जून में रिकॉर्ड मौतें दर्ज की गई हैं। सरकारी आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद पता चला है कि अप्रैल-मई में जानलेवा डेल्टा वैरिएंट के साथ संक्रमण की रफ्तार तेज थी। इसी का नतीजा था कि स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह बेपटरी हो गई थी। हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस रिपोर्ट पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में 2.97 करोड़ लोग कोरोना की चपेट में आए और इसमें से 4,03,281 लोगों की मौत हो गई। विशेषज्ञों का मानना है कि 135 करोड़ की आबादी वाले देश में अमेरिका और ब्राजील की तुलना में थोड़ी ही कम मौतें हुई हैं। ये भी संभावना जताई है कि महामारी के कारण मौतों का आंकड़ा अधिक भी हो सकता है। राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को मुहैया कराए गए आंकड़ों के अनुसार केस फैटेलिटी रेट (सीएफआर) जून में तीन फीसदी बढ़ गया जो अक्तूबर में 1.26 फीसदी था।
दिल्ली के पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट चंद्रकांत लाहरिया का कहना है कि भारत का सीएफआर 1.31 फीसदी था जो दुनिया में सबसे कम है। वह कहते हैं कि सरकार ने इस आधार पर ये भी जताया की उसकी मेहनत और कोशिश की बदौलत ही ये सब संभव हो पाया है। हालांकि महामारी की दूसरी लहर का अधिक प्रभाव उत्तरी भारत में था जहां आंकड़ों की रिपोर्टिंग अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर नहीं है।
दक्षिणी राज्यों में सही रिपोर्टिंग
विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना की दूसरी लहर ने दक्षिणी राज्यों में देर से दस्तक दी। मौत के आंकड़े बढ़े तो उन्होंने सार्वजनिक भी किया। जबकि कई राज्यों ने इस पर स्पष्ट आंकड़े पेश नहीं किए। वहीं, बिहार में अदालत ने डेथ ऑडिट के लिए कहा तो जून के शुरुआत में एक दिन में चार हजार मरीजों की मौत का आंकड़ा सामने आया। महाराष्ट्र में मौतों के आंकड़ों में तब बढ़ोतरी दर्ज की गई जब कुछ मामले अचानक सामने आए।
डेल्टा वैरिएंट मौतों का प्रमुख कारक
विशेषज्ञों का कहना है कि डेल्टा वैरिएंट वाले संक्रमण के मामले में कमी दर्ज की जा रही है, लेकिन मौतों का आंकड़ा उतनी तेजी से कम नहीं हो रहा है। इसका कारण लॉकडाउन में दी गई ढील हो सकता है। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ के हेड राजीब दासगुप्ता बताते हैं कि रोजाना होने वाली मौतों में तेजी से कमी न होने का कारण पाबंदियों में देरी है। दूसरी लहर से प्रशासन को सबक लेते हुए महामारी के उग्र होने से पहले ही समय रहते पाबंदियां लागू कर दी जाएं तो संक्रमण की रफ्तार के साथ मौतों को भी काबू में रखा जा सकता है।