मुस्लिमों के प्रमुख संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने मीडिया में ‘कोरोना जिहाद’ या ‘कोरोना आतंकवाद’ जैसे शब्दों के उपयोग पर गहरी आपत्ति जताई है। संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक याचिका दायर कर कहा है कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई की मीडिया में हो रही रिपोर्टिंग के दौरान इन शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन इन शब्दों के उपयोग से मुसलमानों की भावनाओं को ठेस लगती है।
इससे यह भी संदेश जा रहा है कि कोरोना के संक्रमण के लिए मुस्लिम समाज ही विशेष रूप से जिम्मेदार है, जो बेहद गलत है। संगठन ने सुप्रीम कोर्ट से इन शब्दों के उपयोग पर पाबंदी लगाने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इसे अनुच्छेद 21 का उल्लंघन भी बताया गया है। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले को उठाते हुए संगठन ने कुछ मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला भी दिया है।
जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने मंगलवार को एक प्रेस वक्तव्य जारी कर कहा कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में इस तरह की रिपोर्टिंग की जा रही है, जिससे यह संदेश जा रहा है कि देश में कोरोना संक्रमण के फैलाव के लिए अकेले मुस्लिम समाज ही जिम्मेदार है।
यह इस महामारी को भी सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश है, जो देश की धार्मिक सद्भावना को चोट पहुंचाती है। उन्होंने इसे मुस्लिम समाज का अपमान भी बताया है।
वहीं, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मुफ्ती अतीक बस्तावी ने भी इस तरह की रिपोर्टिंग पर अपनी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि मीडिया हमारे समाज की सच्चाइयों को बयान करने वाला सबसे मजबूत स्तंभ है।
उससे बेहद सटीक और निष्पक्ष भूमिका की उम्मीद की जाती है। चूंकि उसकी खबरों का समाज पर बड़ा असर पड़ता है, अपनी रिपोर्टिंग के दौरान उसे ऐसी कोई भी आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जिससे सामाजिक विद्वेष बढ़े।